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संपादकीयः खुदकुशी का सिलसिला

विडंबना यह है कि शायद हमारा समाज अभी इस स्तर तक संवेदनशील नहीं हुआ है या फिर भावनात्मक स्तर पर उसमें सामूहिकता का विकास नहीं हुआ है कि वह अपने अपने दायरे और पहुंच वाले लोगों के ही सही, कम से कम जाहिर हो सके उथल-पुथल पर भी गौर कर सके और वक्त पर उनके लिए सहारा बन जाए।

बीते दो दिनों में समीर शर्मा और अनुपमा पाठक की आत्महत्या की घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि परदे की चकाचौंध के पीछे या तो सब कुछ ठीक नहीं है।

परदे पर अमूमन हर कहानी के जरिए जिंदगी और उसकी सार्थकता के पैगाम देने वाली फिल्मों और टीवी की दुनिया में आखिर क्या हो गया है कि लगातार चमकते सितारों की खुदकुशी की खबरें आने लगी हैं! बीते दो दिनों में समीर शर्मा और अनुपमा पाठक की आत्महत्या की घटना ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि परदे की चकाचौंध के पीछे या तो सब कुछ ठीक नहीं है या फिर वहां हालात से लड़ते कलाकारों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है, जो वक्त पर उन्हें थाम ले। टीवी पर ‘सास भी कभी बहू थी’, ‘कहानी घर-घर की’ और ‘लेफ्ट राइट लेफ्ट’ जैसे धारावाहिकों में अपनी भूमिकाओं से लोकप्रिय हुए अभिनेता समीर शर्मा ने किसी को कुछ नहीं बताया कि वे क्यों खुदकुशी कर रहे हैं, लेकिन अपने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरों के जरिए उन्होंने जिस तरह खुद को अभिव्यक्त करने की कोशिश की थी, उससे उनकी मनोस्थितियों के संकेत समझे जा सकते थे। इसी तरह, भोजपुरी फिल्मों में अभिनय करने वाली अनुपमा पाठक ने खुदकुशी से एक दिन पहले फेसबुक लाइव के जरिए लोगों के स्वार्थी और मौकापरस्त होने बारे में जिस तरह के खयाल जाहिर किए थे, उससे साफ था कि वे निराश हैं और गहरे अवसाद में हैं।

विडंबना यह है कि शायद हमारा समाज अभी इस स्तर तक संवेदनशील नहीं हुआ है या फिर भावनात्मक स्तर पर उसमें सामूहिकता का विकास नहीं हुआ है कि वह अपने अपने दायरे और पहुंच वाले लोगों के ही सही, कम से कम जाहिर हो सके उथल-पुथल पर भी गौर कर सके और वक्त पर उनके लिए सहारा बन जाए। वरना समीर शर्मा और अनुपमा पाठक, दोनों ने अपने सोशल मीडिया पर जिस तरह की तस्वीरों और वीडियो के जरिए अपनी मनोस्थितियों को अभिव्यक्त किया था, उससे साफ था कि वे किसी गंभीर भावनात्मक द्वंद्व और अवसाद से गुजर रहे हैं और खुद को अकेला पा रहे हैं। अनुपमा पाठक ने आत्महत्या नोट में अपनी आर्थिक मुश्किल के बारे में भी जिक्र किया है। लेकिन इसके बावजूद उन तक उनके करीबी लोगों की वक्त पर पहुंच नहीं हो सकी और उन्होंने जान दे दी। यह अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कोई व्यक्ति अगर अवसाद की चपेट में आ गया है तो वह किस चरण में है और कब खुदकुशी कर लेगा। लेकिन कम से कम अभिव्यक्त व्यवहार या खयालों से मनोभावों में छिपे संकेतों का समझा जा सकता है। अफसोस कि ऐसा बहुत कम होता है कि हम ‘हालचाल जानने’ की औपचारिकता से आगे जाकर किसी की भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं।

हाल में सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की घटना ने व्यापक पैमाने पर लोगों को भावनात्मक स्तर पर झकझोर दिया। इसके पहले प्रेक्षा मेहता और दिशा सालियान ने खुदकुशी कर ली। अभिनय की दुनिया से आत्महत्या की घटनाओं की लगातार आ रही खबरें इसलिए चिंतित करती हैं कि हाल के दिनों में क्या कुछ ऐसा तेजी से बदल रहा है, जिसमें परदे पर जीवन का संदेश देने वाले कलाकार अपनी दुनिया में अकेले पड़ते जा रहे हैं और किन्हीं कमजोर क्षणों में टूट जाते हैं। यह एक वजह हो सकती है कि पिछले करीब पांच महीने से बॉलीवुड सहित तमाम गतिविधियां ठप्प पड़ी हैं और इसका असर आम लोगों के साथ-साथ कलाकारों की आर्थिक-सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सेहत पर भी पड़ रहा होगा। लेकिन यहीं एक सवाल वहां की सामाजिकता पर उठाया जा सकता है। क्या बॉलीवुड की दुनिया एक समाज के रूप में भीतर से इतनी एकाकी और अपने दायरों में कैद हो चुकी है कि उसमें किसी ‘अन्य’ के दुखों के लिए संवेदनाओं की जगह सिमटती जा रही है?

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