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गठबंधन की राह

भाजपा को गठबंधन का झटका 1993 में भी लगा था। तब वह अपराजेय दिख रही थी, मगर सपा और बसपा के गठबंधन ने उसका रथ रोक दिया था।

साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी और अखिलेश यादव। ( Photo Source: PTI)

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की घोषणा के बाद रविवार को दोनों पार्टियों का पहला बड़ा साझा कार्यक्रम था लखनऊ में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के रोड शो का। गठबंधन का पहला तकाजा एकता व एकजुटता जाहिर करने का होता है, और दूसरा, बढ़ी हुई ताकत प्रदर्शित करने का। खबरें बताती हैं कि दोनों लिहाज से यह कार्यक्रम सफल कहा। ‘यूपी को यह साथ पसंद’ आएगा या नहीं, यानी उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे क्या होंगे, यह तो बाद में पता चलेगा, पर यह साफ दिखता है कि भाजपा और बसपा के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। यह दिलचस्प है कि इस गठबंधन के पीछे जहां भाजपा को बसपा की भूमिका दिखती है वहीं बसपा को भाजपा की। यह भी कम विचित्र नहीं है कि गठबंधन को लेकर सबसे ज्यादा रंज मुलायम सिंह को है, जो कल तक सपा के सर्वेसर्वा थे। नाराजगी में उन्होंने गठबंधन के लिए चुनाव प्रचार न करने का एलान किया है। पर इससे शायद ही कोई फर्क पड़े क्योंकि सपा अब पूरी तरह अखिलेश की लोकप्रियता के सहारे है। रोड शो का एक मकसद गठबंधन के दोनों दलों के कार्यकर्ताओं की हौसला आफजाई करना रहा होगा और इसमें भी यह कार्यक्रम कामयाब कहा जाएगा।

गठबंधन के बाद सपा और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नजर आ रही हैं, पर यह गठबंधन दोनों दलों की अपनी-अपनी कमजोरी की स्वीकृति भी है। पिछले चुनाव में सपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था। पांच साल के कार्यकाल के बाद अखिलेश यादव को मैदान में अकेले उतरना बहुत जोखिम भरा लगा और एक अन्य पार्टी को साथ लेने की जरूरत महसूस हुई। वहीं कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने के बाद भी खुद को पूरे प्रदेश में मुख्य मुकाबले में लाने का आत्मविश्वास नहीं दिख रहा था। राहुल गांधी की खाट सभाएं भी कोई खास असर नहीं छोड़ पाई थीं। यही वजह रही होगी कि जो कांग्रेस ‘सत्ताईस साल यूपी बेहाल’ का राग अलाप रही थी और अखिलेश यादव को मुजफ्फरनगर के दंगों के लिए जवाबदेह ठहरा रही थी, उसे सपा से गठबंधन में ही भलाई नजर आने लगी। लिहाजा, गठबंधन ने कांग्रेस को न सिर्फ लाज बचाने का रास्ता दे दिया, बल्कि नए उत्साह से लबरेज भी कर दिया है। यहां भी कांग्रेस की वही रणनीति दिखती है जो बिहार में थी। जिन राज्यों में वह अकेले मुख्य मुकाबले में आने में फिलहाल सक्षम नहीं है वहां कनिष्ठ साझेदार की भूमिका को स्वीकार कर लेना और भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की कोशिश करना।

भाजपा को गठबंधन का झटका 1993 में भी लगा था। तब वह अपराजेय दिख रही थी, मगर सपा और बसपा के गठबंधन ने उसका रथ रोक दिया था। यों कांग्रेस के साथ भी, नरसिंह राव के कार्यकाल में, बसपा का गठजोड़ हुआ था, पर वह अप्रभावी रहा। लेकिन उत्तर प्रदेश में सपा से हुए कांग्रेस के गठबंधन को अगले लोकसभा चुनाव के मद््देनजर भी देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं, यानी लोकसभा की हर सातवीं सीट इसी राज्य से है। पिछले लोकसभा चुनाव में अपना दल की दो सीटों को मिला कर भाजपा की झोली में अस्सी में से तिहत्तर सीटें आई थीं। अगर उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन सफल हुआ, तो अखिलेश का भी कद बढ़ेगा और राहुल का भी। इससे विपक्ष की राजनीति को ताकत मिलेगी। यही नहीं, तब अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं होगी।

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