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संपादकीय: अभाव का पाठ

क्या स्कूलों में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए नियमित स्कूली पढ़ाई का यह एक कारगर विकल्प है? आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को मुख्य विकल्प बनाने से पहले क्या जमीनी स्तर पर इसके असर का अध्ययन किया गया है? अगर इस माध्यम पर निर्भरता की वजह से देश के कुल बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई-लिखाई से वंचित हो जाए तो इसकी सार्थकता पर सवाल उठेंगे।

आज लाखों की संख्या में छोटे बच्चे ऑननलाइन पढ़ाई का दबाव झेल रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना के संक्रमण से बचाव फिलहाल एक प्राथमिक जरूरत है। इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती शैक्षिक संस्थानों के रूप में स्कूल और कॉलेजों के सामने है। पिछले पांच महीने से स्कूल-कॉलेज बंद हैं और उसकी भरपाई के लिए आनलाइन माध्यम से पढ़ाई पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन इसके लिए जरूरी संसाधनों के मामले देश भर में जो तस्वीर है, उसमें क्या आनलाइन शिक्षा की ओर बढ़ते कदम कोई बेहतर नतीजा दे सकते हैं?

क्या स्कूलों में पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए नियमित स्कूली पढ़ाई का यह एक कारगर विकल्प है? आनलाइन शिक्षा व्यवस्था को मुख्य विकल्प बनाने से पहले क्या जमीनी स्तर पर इसके असर का अध्ययन किया गया है? अगर इस माध्यम पर निर्भरता की वजह से देश के कुल बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई-लिखाई से वंचित हो जाए तो इसकी सार्थकता पर सवाल उठेंगे।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् यानी एनसीईआरटी की ओर से देश भर में कराए गए एक सर्वेक्षण में जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, वह आनलाइन माध्यम से पढ़ाई की सीमाओं को ही रेखांकित करती है।

सर्वेक्षण के मुताबिक देश भर में सत्ताईस फीसद विद्यार्थियों के पास स्मार्टफोन या फिर लैपटॉप जैसे बुनियादी संसाधन ही नहीं हैं, जिसके जरिए वे आनलाइन कक्षाओं में शामिल हो सकें। अट्ठाईस फीसद लोगों ने बिजली की उपलब्धता को एक बड़ी समस्या बताया। फिर आर्थिक वजहों से इंटरनेट तक पहुंच और नेटवर्क की स्थिति की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। बहुत सारे शिक्षक भी अभी तकनीकी तौर पर प्रशिक्षित और सहज नहीं हैं। ये तकनीक और संसाधनों के अभाव या उसकी मुश्किल से जुड़ी समस्याएं हैं, जिनके रहते आॅनलाइन शिक्षा अपने मकसद में नाकाम हो सकती है। इसके अलावा, सर्वेक्षण में ही विज्ञान और गणित जैसे विषयों के शिक्षण और उसे समझने में विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों को दर्ज किया गया है।

यों भी, नियमित स्कूली पढ़ाई, कक्षा में शिक्षक से सीधे संवाद के मनोविज्ञान, देखरेख, सलाह और उसके असर की तुलना आनलाइन शिक्षा से नहीं की जा सकती। सवाल है कि इन हालात में आनलाइन पढ़ाई पर जोर देने का क्या आधार हो सकता है। कुछ समय पहले केरल में एक बच्ची संसाधनों के अभाव में आनलाइन कक्षा में शामिल नहीं हो सकी और यह स्थिति लंबे समय तक बने रहने के डर से उसने आत्महत्या कर ली। इस तरह की घटना को इक्का-दुक्का कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। हमारे देश में ज्यादातर आबादी जिन हालात में गुजर-बसर करती है, उसमें अभाव और वंचना की स्थितियों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एनसीईआरटी के सर्वेक्षण में केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में पढ़ने वाले करीब अठारह हजार के आसपास ही बच्चे शामिल थे। देश भर में फैले बाकी सरकारी स्कूलों के बच्चों और उनके परिवारों की आर्थिक हालत के मद्देनजर यह अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि आनलाइन शिक्षा पर निर्भरता से कितनी बड़ी तादाद में बच्चों की पढ़ाई बाधित हो जाएगी या वे उसके दायरे से बाहर हो जाएंगे।

गरीब और बहुत सारे निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में भी संसाधनों की उपलब्धता से लेकर घर की स्थितियां ऐसी होती हैं, जिसमें ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होना और गंभीरता से पढ़ाई कर पाना एक बड़ी चुनौती होती है। फिर पूर्णबंदी की मार से निकट भविष्य में गरीब तबकों के लोगों की आर्थिक स्थिति में शायद ही कोई सुधार आएगा कि वे अनिवार्य सामानों के अलावा अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए लैपटॉप या स्मार्टफोन जैसे संसाधन ले सकेंगे। ऐसे में ‘सबके लिए शिक्षा’ जैसे नारों और शिक्षा का अधिकार कानून को कैसे जमीन पर उतारा जा सकेगा!

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