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संबोधन और सवाल

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के दशहरा रैली के संबोधन को लेकर देश भर में उत्सुकता थी, तो इसकी वजहें साफ हैं।

Author October 24, 2015 10:52 AM

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के दशहरा रैली के संबोधन को लेकर देश भर में उत्सुकता थी, तो इसकी वजहें साफ हैं। यह संघ का सबसे बड़ा सालाना आयोजन होता है; इस दिन संघ प्रमुख जो कहते हैं उसे वर्तमान हालात में संघ की दिशा का सूचक माना जाता है। दूसरे, इस समय केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसका संघ से नाता जगजाहिर है।

भाजपा के सत्ता में रहने पर नीति-निर्धारण में संघ की अहमियत का अंदाजा सभी को है। पिछले महीने संघ और भाजपा की साझा बैठक भी हो चुकी है जिसमें प्रधानमंत्री और कई वरिष्ठ मंत्रियों ने भी शिरकत की थी। इस पृष्ठभूमि के अलावा एक बात यह भी थी कि इस बार की दशहरा रैली ऐसे समय हुई जब संघ की स्थापना के नब्बे साल हो रहे हैं। इस मौके पर मोहन भागवत ने लगभग एक घंटे के भाषण में जो कुछ कहा उसमें मोटे तौर पर तीन बातें थीं।

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एक यह कि मोदी सरकार अच्छा काम कर रही है और पिछले डेढ़ साल में उसके काम की वजह से दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। दूसरे, हाल की छोटी-मोटी घटनाओं से हिंदू संस्कृति को कोई फर्क नहीं पड़ता। तीसरे, उन्होंने इस विचार को दोहराया कि हिंदू संस्कृति, हिंदू पूर्वज और मातृभूमि, इन तीन आस्थाओं के आधार पर भारतीय समाज को संगठित किया जा सकता है।

इसमें कोई नई बात नहीं है, संघ की स्थापना और उसके सक्रिय बने रहने के पीछे यही विचार रहा है। जहां तक मोदी सरकार की तारीफ की बात है, संघ और भाजपा के रिश्ते को देखते हुए इसमें भी शायद ही किसी को हैरानी हुई हो। फिर, आरक्षण संबंधी अपने बयान से भाजपा को परेशानी में डाल चुके भागवत यह कैसे भूल जाते कि बिहार चुनाव चल रहा है और उन्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जिससे भाजपा को दिक्कत हो। लेकिन क्या पिछले डेढ़ साल में सब अच्छा ही अच्छा हुआ है?

इसमें दो राय नहीं कि मोदी सरकार के आने पर खासकर आर्थिक जगत में और विदेश नीति के मोर्चे पर उत्साह का माहौल बना। लालफीताशाही पर अंकुश लगा। स्वच्छ भारत अभियान, जनधन, मुद्रा बैंक, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट शहर जैसी योजनाएं शुरू हुर्इं।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के मोदी के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र ने मंजूरी दी। लेकिन डेढ़ साल बीतते-बीतते विदेश नीति के मोर्चे पर दिख रही चमक नेपाल के साथ उभरी खटास ने फीकी कर दी। फिर दादरी कांड, कन्नड़ विद्वान एमएम कलबुर्गी की हत्या और उस पर लेखकों के विरोध, शिवसेना की हाल की करतूतों और पिछले दिनों हरियाणा के सुनपेड़ गांव में एक दलित परिवार के दो बच्चों को जिंदा जला दिए जाने और उस पर एक केंद्रीय मंत्री के आपत्तिजनक बयान आदि के चलते देश में नई चिंता पैदा हुई है।

इन वाकयों से देश की लोकतांत्रिक साख की बाबत अच्छा संदेश नहीं गया है। जिन घटनाओं के कारण राष्ट्रपति को एक पखवाड़े के भीतर दो बार देश को यह याद दिलाने की जरूरत महसूस हुई हो कि बहुलतावाद और सहिष्णुता हमारी सभ्यता के बुनियादी मूल्य हैं और हमारे संविधान के भी आधार हैं, उन घटनाओं को छोटी-मोटी कह कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

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