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परिसर में खुदकुशी

हैदराबाद पुलिस ने जो एफआइआर दर्ज की है उसमें विद्यार्थी परिषद के दो छात्र नेताओं के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री तथा सिकंदराबाद से भाजपा के सांसद बंगारू दत्तात्रेय और विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव का नाम भी आरोपी के तौर पर शामिल है।

Author नई दिल्ली | January 20, 2016 12:05 AM
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आइसा कार्यकर्ता दलित रिसर्च वेमुला रोहित की आत्महत्या के विरोध में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय का पुतला जलाते हुए। (पीटीआई फोटो)

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोत्र छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी पर छात्र संगठनों का आक्रोश स्वाभाविक है। इस घटना पर दिल्ली समेत देश में बहुत-सी जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए। हैदराबाद पुलिस ने जो एफआइआर दर्ज की है उसमें विद्यार्थी परिषद के दो छात्र नेताओं के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री तथा सिकंदराबाद से भाजपा के सांसद बंगारू दत्तात्रेय और विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव का नाम भी आरोपी के तौर पर शामिल है। इससे कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों को भाजपा को घेरने का अच्छा मौका मिल गया है। कांग्रेस ने मंत्रिमंडल से दत्तात्रेय को हटाए जाने की मांग भी उठाई है। रसूख वाले लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करानी हो, तो पुलिस का रवैया कैसा रहता है यह किसी से छिपा नहीं है। एक केंद्रीय मंत्री और एक विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ पुलिस ने एफआइआर दर्ज की, तो यह राज्य सरकार में शीर्ष स्तर से आए निर्देश के बिना नहीं हुआ होगा। तेलंगाना में फरवरी में निकाय चुनाव होने हैं, और ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति इस मामले को भाजपा के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है। टीआरएस नेतृत्व को इससे पहले कोई हस्तक्षेप करने की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई, जबकि रोहित और उनके साथी अन्य चार छात्र महीनों से अपना निलंबन वापस कराने के लिए जूझ रहे थे? रोहित को विज्ञान में रस था और वे लेखक भी बनना चाहते थे। उनमें इसकी संभावना भी थी, जो कि खुदकुशी से पहले लिखे उनके मार्मिक पत्र से जाहिर है। इस आखिरी पत्र में उन्होंने अपनी आत्महत्या के लिए किसी को दोषी ठहराने की कोशिश नहीं की है। पर यह घटना शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव की कड़वी हकीकत को जरूर रेखांकित करती है।

रोहित समेत पांच दलित छात्रों को, जो कि एएसए यानी आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े थे, पिछले साल संघ परिवार की छात्र शाखा विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों से लड़ाई-झगड़े के बाद निलंबित कर दिया गया था। आरोप है कि यह कार्रवाई मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को लिखे दत्तात्रेय के पत्र का नतीजा थी। आरोप जांच का विषय है। पर सवाल है कि दो पक्षों के झगड़े में केवल एएसए से जुड़े छात्रों पर ही क्यों कार्रवाई की गई? फिर, क्या यह कार्रवाई आनुपातिक थी? निलंबन के बजाय पहले नोटिस या चेतावनी देने जैसे अन्य कदम नहीं उठाए जा सकते थे? क्या रोहित और उसके मित्रों के निलंबन को दूसरे पक्ष की सत्ता के गलियारे में पहुंच से अलग करके देखा जा सकता है? हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में पिछले एक दशक में दलित छात्र के खुदकुशी करने की यह नौवीं घटना है। संस्थान-विशेष से अलग हट कर देखें तो पिछले चार साल में अठारह दलित विद्यार्थी आत्महत्या कर चुके हैं। आखिर ये तथ्य क्या बताते हैं? यही कि हमारे आम समाज में तो अनुसूचित जातियों के प्रति तिरस्कार और दुराव व्यापक रूप से मौजूद है ही, शिक्षा संस्थान भी इनसे अछूते नहीं हैं। और भी बड़ी विडंबना यह है कि कई बार बहुत प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय और संस्थान भी इस तरह के व्यवहार में शामिल दिखते हैं। कुछ साल पहले बनी थोराट समिति ने एम्स में दलित विद्याथियों के साथ भेदभाव के आरोपों को सही पाया था। रोहित की मौत ने एक बार फिर हमारे शैक्षिक परिसरों का एक बहुत दुखद पहलू उजागर किया है। क्या दलितों के साथ होने का राष्ट्रीय संकल्प आंबेडकर की प्रतीक-पूजा भर होकर रह जाएगा!

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