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संपादकीयः गुणवत्ता की सड़क

सड़क निर्माण को शायद सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता को लेकर हमेशा संशय बना रहता है।

Author March 24, 2016 4:11 AM
(Express Photo)

सड़क निर्माण को शायद सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता को लेकर हमेशा संशय बना रहता है। यह आम है कि भारी राशि खर्च करके कोई सड़क तैयार की जाती है और बारिश या वाहनों के दबाव से कुछ ही समय बाद उसके टूटने की खबर आ जाती है। शायद इसी के मद्देनजर मंगलवार को ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनाई जा रही सड़कों की गुणवत्ता की सख्त निगरानी सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक प्रभावशाली तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया। छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण की निविदा निकलने से लेकर सामग्री की खरीद, निर्माण और रख-रखाव तक भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार पसरा हुआ है।

पिछले आठ-दस सालों के दौरान देश भर में सड़कों का जाल बिछाने की कोशिश की गई, बहुत सारे दूरदराज के इलाकों को मुख्य सड़कों से जोड़ा गया। खासकर जब से प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना की शुरुआत हुई, उसके बाद इस क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल हुई। लेकिन सवाल है कि इतने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण के साथ क्या गुणवत्ता का भी खयाल रखा गया? इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर महज दो-तीन साल पहले की बनी हुई सड़कों को भी आज इस कदर दुर्दशा में देखा जा सकता है कि उस पर सहज तरीके से वाहन न चल पाएं। जब दिल्ली में सड़कें धंसकने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो दूर-दराज इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ऐसा इसलिए संभव होता है कि किसी खास दूरी में सड़क निर्माण के लिए सब कुछ नाप-तौल कर बजट बनाया जाता है, मानक तय किए जाते हैं और राशि जारी की जाती है। लेकिन संबंधित महकमे के अधिकारियों से लेकर निचले स्तर के ठेकेदार तक भ्रष्ट तरीके से इसी राशि में से हिस्सा बंटाने के फेर में इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते कि इसका सड़क की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा। बचे हुए पैसे में काम पूरा करने की कोशिश का नतीजा यह होता है कि जिस सड़क को बनाने में जितनी और जिस स्तर की सामग्री का उपयोग होना चाहिए उसमें कभी मामूली तो कभी ज्यादा कटौती कर दी जाती है।

ऐसा शायद इसलिए हो पाता है कि राशि जारी करने से लेकर निर्माण की समूची प्रक्रिया के पूरा होने और फिर देखरेख पर निगरानी तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में साधारण लोगों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता कम है कि उनके उपयोग के लिए जो सड़क बनाई जा रही है, अगर वह तय मानकों के हिसाब से नहीं बनी है तो वे शिकायत करें। मगर अब तकनीक और संचार के बढ़ते दायरे के दौर में प्रधानमंत्री ने जिस अभिनव पहल की बात की है, उसके तहत ‘मेरी सड़क’ नामक ऐप के जरिए नागरिक शिकायतों के निवारण की भी व्यवस्था की जाएगी। जाहिर है, अगर सड़क निर्माण के क्षेत्र को भ्रष्टाचार और अनदेखी की समस्या से मुक्त करने के उपाय किए जा सके, तो यह जन-कल्याण के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी होगी। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सड़कें केवल सुगम आवाजाही का जरिया नहीं, बल्कि वे किसी इलाके से लेकर समूचे देश की अर्थव्यवस्था का सबसे मुख्य आधार होती हैं।

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