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गठबंधन की गूंज

मगर पटना के गांधी मैदान में आयोजित रैली में जिस तरह राज्य के बीस जिलों में बाढ़ की स्थिति के बावजूद बड़ी संख्या में लोग जुटे, उससे निस्संदेह विपक्ष को बल मिला है।

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बिहार में एक बार फिर महागठबंधन ने देश बचाओ भाजपा भगाओ नारे के साथ एकजुटता दिखाई है। नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद लग रहा था कि महागठबंधन में शामिल पार्टियां कमजोर पड़ जाएंगी। मगर पटना के गांधी मैदान में आयोजित रैली में जिस तरह राज्य के बीस जिलों में बाढ़ की स्थिति के बावजूद बड़ी संख्या में लोग जुटे, उससे निस्संदेह विपक्ष को बल मिला है। रैली का आयोजन राजद ने किया था, पर उसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव और कांग्रेस से गुलाम नबी आजाद भी शामिल हुए। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फोन के जरिए रैली को संबोधित किया। सबसे अहम बात कि पार्टी की तरफ से रैली में शामिल न होने की चेतावनी के बावजूद जनता दल (यूनाइटेड) के बागी नेता शरद यादव और अली अनवर ने मंच साझा किया और घोषणा की कि पार्टी का असली नेतृत्व उनके पास है, क्योंकि पार्टी के ज्यादातर सदस्य उनके साथ हैं। यह अलग बात है कि इस रैली के बाद जद (एकी) में टूट स्पष्ट हो जाएगी और नए सिरे से जनाधार का समीकरण बिठाया जाएगा।

रैली में नीतीश कुमार के बहाने भाजपा को निशाना बनाया गया। सांप्रदायिकता को इस समय देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया। महागठबंधन से अलग होकर नीतीश कुमार ने भाजपा से हाथ मिला लिया, तभी लालू प्रसाद यादव ने आह्वान किया था कि शरद यादव को उनके साथ मिलकर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक मोर्चा बनाना चाहिए। शरद यादव की छवि साफ-सुथरे नेता की रही है। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ मुखर रहे हैं। इसी आधार पर भाजपा से अलग होकर जद (एकी) ने राजद और दूसरे दलों के साथ साझा मंच बनाया था और विधानसभा चुनावों में भाजपा को शिकस्त दी थी। हालांकि अब शरद यादव की बगावत का नतीजा स्पष्ट है। उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ेगा, उनकी राज्यसभा की सदस्यता भी जा सकती है। पर उनके इस तरह अलग होने से नीतीश कुमार के जनाधार पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। बेशक इस रैली और विपक्षी दलों की एकजुटता के देशव्यापी असर का दावा करना जल्दबाजी होगी, पर यह बनी रही तो बिहार की राजनीति पर स्पष्ट प्रभाव पड़ेगा।

विपक्षी दलों ने केंद्र में भाजपा सरकार के तीन सालों में सांप्रदायिकता बढ़ने, रोजगार के नए अवसर उपलब्ध न कराए जा सकने, महंगाई न रुक पाने, नोटबंदी और जीएसटी के बाद लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ने जैसे मुद्दे तो उठाए, पर भ्रष्टाचार को लेकर कोई बात नहीं की। जद (एकी) का नीतीश कुमार धड़ा इसी बात को रेखांकित कर रहा है कि इस रैली का आयोजन लालू प्रयाद यादव ने अपने परिजनों के भ्रष्टाचार पर परदा डालने के मकसद से किया। भाजपा भी अपने ऊपर लगने वाले सांप्रदायिकता के आरोपों के बरक्स भ्रष्टाचार का अस्त्र इस्तेमाल करती आ रही है। ऐसे में लालू यादव का देश बचाओ भाजपा भगाओ का नारा कितना दमदार साबित होगा, देखने की बात है। शरद यादव भी भ्रष्टाचार के मामले में भले यह कह कर लालू यादव का बचाव करने की कोशिश करें कि सांप्रदायिकता से लड़ना इस समय की बड़ी जरूरत है, पर इसका असर अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा दूसरे वर्गों पर कितना हो पाएगा, कहना मुश्किल है। हालांकि यह एकजुटता और विपक्ष का यह तेवर लगातार बना रहेगा, तो भाजपा की जवाबदेहियां रेखांकित होंगी।

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