वायु प्रदूषण केवल महानगरों और बड़े शहरों की समस्या नहीं है, छोटे शहर भी इससे प्रभावित हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से यह दावा किया जाता है कि प्रदूषण को कम करने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं। देश भर में वायु गुणवत्ता का पता लगाने के लिए निगरानी केंद्र बनाए जाने की बात कही जाती है, मगर हकीकत यह है कि देश के करीब चालीस फीसद जिलों में अब तक निगरानी केंद्र स्थापित नहीं हो पाए हैं।
ऐसे में जब यह पता ही नहीं चल पाएगा कि हवा में प्रदूषण का स्तर कितना है, तो उसे कम करने के प्रयास भी सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेंगे। वैश्विक कंपनी ‘एअरवाइस’ की ओर से बीते मंगलवार को जारी एक अध्ययन रपट में बताया गया है कि कई शहरों और कस्बों में लोगों को अपने आसपास फैल रहे प्रदूषण के बारे में वास्तविक जानकारी ही नहीं मिल पाती है, जिस कारण उनके स्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ रहा है।
गौरतलब है कि मुंबई, दिल्ली और बंगलुरु जैसे बड़े शहरों में तो वायु प्रदूषण पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, लेकिन इस मामले में छोटे शहरों और कस्बों की आज भी अनदेखी की जा रही है। निगरानी केंद्र होने का एक फायदा यह है कि इससे आम लोगों को हवा में प्रदूषक तत्त्वों के स्तर की स्टीक जानकारी नियमित रूप से मिलती रहती है। ऐसे में सरकार और स्थानीय प्रशासन की ओर से उठाए जाने वाले कदमों के साथ-साथ लोग खुद भी सतर्क रहते हैं और मास्क लगाने तथा जरूरत पड़ने पर ही घरों से बाहर निकलने जैसे उपायों को प्राथमिकता देते हैं।
मगर जब लोगों को इसकी सही जानकारी ही नहीं मिलेगी, तो वे इस तरह की सावधानी कैसे बरतेंगे। यह बात भी सामने आई है कि कुछ जिलों में निगरानी केंद्र तो हैं, लेकिन वे सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि देश के तमाम शहरों में वायु गुणवत्ता को मापने के लिए माकूल तकनीकी व्यवस्था की जाए और निगरानी केंद्रों के उचित रख-रखाव के लिए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
