महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक में दूषित हवा के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। विभिन्न अध्ययन रपटों में यह बात सामने आई है कि ज्यादातर बड़े शहरों में शोर का स्तर तय मानकों से काफी अधिक है। इसका मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है और बहरापन, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, नींद की कमी तथा मानसिक तनाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इसी के मद्देनजर हाल में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने राष्ट्रीय राजधानी में नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई, उचित निगरानी और जुर्माना अनिवार्य कर दिया गया है। मगर सवाल है कि क्या कागजों में कड़े प्रावधान कर देने से ध्वनि प्रदूषण को रोका जा सकता है? इससे संबंधित नियम-कानून से लेकर अदालतों के आदेश पहले से मौजूद हैं, तो फिर नए निर्देश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी! जाहिर है कि कार्यान्वयन में कई स्तरों पर लापरवाही बरती जा रही है।
गौरतलब है कि ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत लागू किया गया था। इन नियमों का उद्देश्य लाउडस्पीकर, वाहनों के हार्न, निर्माण कार्य और औद्योगिक मशीनों जैसे सभी स्रोतों से ध्वनि के स्तर को नियंत्रित कर जनस्वास्थ्य तथा पर्यावरण की सुरक्षा करना है।
नियमों में विभिन्न क्षेत्रों के लिए दिन और रात के समय ध्वनि के मानक तय किए गए हैं, जिनमें संबंधित प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना रात दस बजे से सुबह छह बजे के बीच लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध भी शामिल है। मगर इन नियमों को जमीनी स्तर पर लागू करने का जिम्मा संभाले प्राधिकारियों के दायित्व, निष्पक्षता और ईमानदारी पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।
आलम यह है कि कई जगह ध्वनि प्रदूषण को मापने के लिए लगाए गए यंत्र निष्क्रिय पड़े हैं और जहां ये यंत्र काम कर रहे हैं, उनमें दर्ज आंकड़ों का भी शोर कम करने के उपायों में समुचित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इससे स्पष्ट है कि जब तक अधिकारियों के स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक किसी भी नियम और दिशा-निर्देश का असर धरातल पर नजर नहीं आएगा।
