कुश्ती और धींगामुश्ती - Jansatta
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कुश्ती और धींगामुश्ती

भारत की ओर से चौहत्तर किलोग्राम वर्ग में नरसिंह पंचम पहले ही रियो ओलंपिक के लिए चुने जा चुके हैं। लेकिन चूंकि सुशील कुमार ने ज्यादा योग्य उम्मीदवार को ओलंपिक में भेजने की मांग के साथ उनके और नरसिंह पंचम के बीच मुकाबले का सवाल उठा दिया है

Author नई दिल्ली | May 19, 2016 3:23 AM
पहलवान नरसिंह यादव बनाम सुशील कुमार।

इस साल ओलंपिक प्रतियोगिताएं शुरू होने में ज्यादा दिन नहीं रह गए हैं, लेकिन उसमें भेजे जाने वाले खिलाड़ियों को लेकर भारत में अब भी खींचतान चल रही है। इससे एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि सुनियोजित तैयारी न होने के अलावा दूसरे कई तत्त्व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के पिछड़ने की वजह बनते हैं। ताजा उदाहरण ओलंपिक में पुरुषों की कुश्ती प्रतियोगिता के चौहत्तर किलोग्राम वर्ग में भारत के प्रतिनिधित्व पर उपजा विवाद है, जिसमें दो अहम खिलाड़ियों, नरसिंह पंचम यादव और सुशील कुमार में से किसी एक को चुनने का मामला उलझ गया है। हालत यह है कि इस मसले पर सुशील कुमार की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट को कहना पड़ा है कि डब्ल्यूएफआइ यानी भारतीय कुश्ती महासंघ सुशील के रिकॉर्ड पर गौर करते हुए उनकी सुने और फैसला करे कि रियो ओलंपिक में कुश्ती प्रतियोगिता के पुरुषों के चौहत्तर किलोग्राम वर्ग में भारत की नुमाइंदगी कौन करेगा।

इस मामले में दोनों खिलाड़ियों के दावों के बीच जिस तरह की मुश्किल खड़ी हो गई है, उससे यही लगता है कि यहां देश के बजाय व्यक्तियों का सवाल ज्यादा अहम हो गया है। गौरतलब है कि भारत की ओर से चौहत्तर किलोग्राम वर्ग में नरसिंह पंचम पहले ही रियो ओलंपिक के लिए चुने जा चुके हैं। लेकिन चूंकि सुशील कुमार ने ज्यादा योग्य उम्मीदवार को ओलंपिक में भेजने की मांग के साथ उनके और नरसिंह पंचम के बीच मुकाबले का सवाल उठा दिया है, इसलिए मामला और उलझ गया है। मुश्किल यह है कि अगर डब्ल्यूएफआइ इस पर विचार करता है तो बाकी के सात वजन वर्गों में भी अन्य पहलवानों के बीच ऐसे मुकाबले की मांग उठ सकती है।

दरअसल, ओलंपिक में दावेदारी के लिए मौका कुश्ती के सीधे मुकाबलों में नहीं मिलता, बल्कि डब्ल्यूएफआइ पूर्व के प्रदर्शन के आधार पर किसी पहलवान को चुनता है। चूंकि नरसिंह पंचम चौहत्तर किलोग्राम वर्ग में कुश्ती खेलते रहे हैं और पिछले साल लॉस वेगास में हुई विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में उन्होंने इस वर्ग में कांस्य पदक जीता था, इसीलिए उन्हें चौहत्तर किलोग्राम वर्ग के तहत रियो ओलंपिक के लिए चुना गया। दूसरी ओर, सुशील छियासठ किलोग्राम वर्ग में खेलते रहे हैं। लेकिन अब ओलंपिक में यह भार-वर्ग नहीं है। इसके अलावा, वे चोट और तैयारियों से जुड़े सवालों से भी जूझ रहे हैं। लेकिन उनकी यह शिकायत वाजिब है कि अगर डब्ल्यूएफआइ ने कोई फैसला कर लिया था तो उन्हें पहले संकेत क्यों नहीं दिए गए!

जाहिर है, अगर यह विवाद इतना तूल पकड़ चुका है तो इसके पीछे डब्ल्यूएफआइ का ढुलमुल रवैया है। कम से कम अब जरूरत है कि ताजा विवाद में डब्ल्यूएफआइ किसी ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचे, जिससे उस पर पक्षपात करने का आरोप न लगे। इस संदर्भ में हाईकोर्ट ने बिल्कुल ठीक कहा है कि किसी व्यक्ति को नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन देश को सर्वोपरि रखना चाहिए। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का रिकॉर्ड अगर संतोषजनक नहीं रहा है तो इसका एक बड़ा कारण खिलाड़ियों के चयन की प्रक्रिया, उसमें आपसी खींचतान और कई बार बेहतर खिलाड़ियों को मौका न मिलना भी रहा है। इसमें खेल संगठनों के कर्ताधर्ताओं से लेकर दूसरे सत्ता केंद्रों के बीच टकराव और हित भी काम करते रहते हैं। इसका असर खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर पड़ता है तो नुकसान देश का ही होगा।

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