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जीवट की जीत

देवेंद्र झझारिया ने भालाफेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इससे पहले 2004 के एथेंस पैरालंपिक में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था।

Author नई दिल्ली | Updated: September 16, 2016 4:45 AM
देवेंद्र झाजरिया ने Rio Paralympics 2016 में जेवलिन थ्रो में जीता था गोल्ड।

ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरियो में हाल ही में खत्म हुए ओलंपिक की धूम दुनिया भर में किस कदर रही, यह सभी जानते हैं। लेकिन उसी शहर में चल रहे पैरालंपिक खेल मुकाबलों में बहुतों की कोई रुचि नहीं है और शायद जानकारी भी न हो। जबकि ओलंपिक के समांतर शारीरिक-मानसिक तौर पर किसी कमी के शिकार खिलाड़ियों के लिए होने वाले इस आयोजन में कई चेहरों ने देश का नाम रोशन किया है। मसलन, बुधवार को देवेंद्र झझारिया ने भालाफेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इससे पहले 2004 के एथेंस पैरालंपिक में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था। इस तरह पैरालंपिक खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले वे पहले भारतीय खिलाड़ी हैं। गौरतलब है कि आठ साल की उम्र में पेड़ पर चढ़ते हुए देवेंद्र का हाथ उच्चदाब की बिजली की चपेट में आकर बुरी तरह जल गया, जिसे बाद में काटना पड़ा। लेकिन उनके जीवट में कोई कमी नहीं आई। बार-बार उन्होंने साबित किया कि वे किसी से कम नहीं हैं। इससे पहले मरियप्पन थंगावेलु ने पुरुषों की ऊंची कूद के मुकाबले में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया तो कमर से नीचे पोलियो की शिकार दीपा मलिक ने गोलाफेंक में रजत हासिल किया और वरुण भाटी ने भी ऊंची कूद में कांस्य पदक जीता। इस साल के ओलंपिक में भारत ने अपनी सबसे बड़ी टीम भेजी थी और उम्मीद थी कि हमारे खिलाड़ी कम से कम दस पदक जरूर लेकर आएंगे। लेकिन देश को सिर्फ दो पदकों से संतोष करना पड़ा। जबकि ओलंपिक की तैयारियों में झोंके गए संसाधनों के मुकाबले उपेक्षित पैरालंपिक के खिलाड़ियों ने सीमित सुविधाओं के बीच अपनी किसी शारीरिक या मानसिक कमी के सवाल को पीछे छोड़ते हुए बेहतर प्रदर्शन किया है।

भारत में व्यवस्थागत रूप से खेलों को लेकर क्या रुख रहा है, यह छिपा नहीं है। इसका नतीजा अमूमन हर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में देखने को मिलता रहा है। जब भारत की झोली में एक-दो पदक आ जाते हैं तो उसे किसी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जाता है। जबकि क्षेत्रफल, आबादी और संसाधनों के स्तर पर भारत के मुकाबले कई गुना पीछे रहने वाले देश इस मामले में हमसे काफी आगे दिखते हैं। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में यह तस्वीर अफसोसनाक है। मगर लंबे समय से यह स्थिति बनी हुई है। सवाल है, क्या अकेली कमी खिलाड़ियों की होती है? अब तक जिन खिलाड़ियों को पदक मिले, उनका आकलन किया जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि उनकी तैयारी में जितनी भूमिका देश के खेल-तंत्र की रही, उससे ज्यादा उन्होंने अपने स्तर पर कोशिश की। बल्कि हाल के ओलंपिक के दौरान भारत के खिलाड़ियों को जिन असुविधाओं और व्यवस्थागत अभाव का सामना करने की खबरें आर्इं, वे हैरान करने वाली थीं। ऐसे में किसी शारीरिक या मानसिक कमी का सामना करने के बावजूद पैरालंपिक में हमारे खिलाड़ियों ने देश के नाम शानदार कामयाबी दर्ज की है तो यह उनके जीवट की जीत है। अगर खेलों के मामले में पर्याप्त इंतजाम और प्रतिभाओं की खोज के साथ-साथ उन्हें हर स्तर पर उचित प्रोत्साहन मिले तो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की पदक-तालिका में भारत का नाम अग्रणी देशों के बीच आ सकता है।

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