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संपादकीय: वापसी और हादसे

हुजूम में पैदल चलते, ट्रकों, टेंपो वगैरह में छिप कर अपने घरों को लौटते लोगों को लेकर कई सवाल उठते हैं। सड़कों पर पुलिस की सख्ती है, इसलिए बहुत सारे लोग खेतों की पगडंडियों और रेल की पटरियों के सहारे चले जा रहे हैं। हालांकि सड़कों पर भी कम भीड़ नजर नहीं आती।

Coronavirus lockdownकोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान मजदूरों का पलायन जारी है। (प्रतीकात्मक तस्वीर) (PTI Photo)

प्रवासी मजदूरों का अपने घर लौटना एक तरह से खतरों से खेलने जैसा साबित हो रहा है। यों उन्हें घरों तक पहुंचाने के लिए विशेष रेलें चला दी गई हैं, राज्य सरकारों ने कुछ बसों का भी इंतजाम किया है, पर इन सबका उन्हें समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा। बहुत सारे लोग पैदल, साइकिल, रिक्शा, रेहड़ी वगैरह के सहारे निकल पड़े हैं। वे भूखे-प्यासे, माथे पर गठरी और गोद में बच्चे लिए चिलचिलाती धूप में चलते हर कहीं दिख जाते हैं। ये वे लोग हैं, जिनके पास किसी भी साधन का किराया चुकाने के पैसे नहीं हैं। जिनके पास कुछ पैसे हैं या उधार लेकर कुछ जुगाड़ कर पाए हैं, वे ट्रकों, टेंपो वगैरह का सहारा ले रहे हैं।

ये ट्रक-टेंपो वाले उनसे मनमानी वसूली कर रहे हैं और उन्हें चोरी-छिपे मवेशियों की तरह गाड़ियों में ठूंस कर ले जा रहे हैं। उनमें बहुत सारे छोटे-छोटे बच्चे भी हैं। इन सबके बीच सबसे त्रासद है कि राह चलते बहुत सारे लोग दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। हफ्ता भर पहले औरंगाबाद में रेल की पटरियों पर गाड़ी से दब कर सोलह लोग मर गए। शनिवार को अकेले उत्तर प्रदेश में बारह घंटे के भीतर हुई तीन बड़ी सड़क दुर्घटनाओं में बत्तीस लोगों की जान चली गई और डेढ़ सौ से ऊपर लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके अलावा छिटपुट घटनाओं में अब तक बहुत सारे लोग मारे जा चुके हैं।

इस तरह हुजूम में पैदल चलते, ट्रकों, टेंपो वगैरह में छिप कर अपने घरों को लौटते लोगों को लेकर कई सवाल उठते हैं। सड़कों पर पुलिस की सख्ती है, इसलिए बहुत सारे लोग खेतों की पगडंडियों और रेल की पटरियों के सहारे चले जा रहे हैं। हालांकि सड़कों पर भी कम भीड़ नजर नहीं आती। आखिर उन्हें पुलिस अब कैसे नहीं रोक पा रही। अगर उन्हें जाने दे रही है, तो सड़कों पर चलते हुए उनकी सुरक्षा का इंतजाम क्यों नहीं करती। बंदी के तीसरे चरण में आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई के लिए बड़ी संख्या में ट्रकों, टेंपो वगैरह के लिए रास्ता खोल दिया गया। कुछ बसें भी चलने लगीं।

फिर चौथे चरण में कुछ अधिक छूट मिलने की उम्मीद जगी तो पुलिस शायद और शिथिल हो गई और सामान्य गाड़ियों की आवाजाही बढ़ गई। जहां सड़कें खाली मिलतीं, वहां वाहन बेलगाम भागने शुरू कर देते। इसके चलते भी बहुत सारे लोग वाहनों की चपेट में आकर या वाहनों के संतुलन खो देने की वजह से मारे गए।

दिन में धूप तेज होने की वजह से बहुत सारे लोग रात को चलते हैं। उस वक्त सड़कों पर बत्ती वगैरह न होने की वजह से भी वे तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ गए। सवाल है कि सरकारों ने इन लोगों को इस तरह जान का जोखिम उठाते हुए सड़कों पर चलने क्यों दिया। जब रेलें और बसें चलाने का फैसला हो ही चुका था, तो क्या चरणबद्ध तरीके से इन्हें घर वापस भेजने का समुचित प्रबंध नहीं हो सकता था?

मगर सरकारें इस बात में उलझी रहीं कि इनका किराया कौन वहन करेगा। विचित्र है कि एक तरफ सरकारें इन मजदूरों की सुरक्षा और दशा सुधारने के दावे करते नहीं थकतीं और दूसरी तरफ हकीकत यह है कि मजदूर उनकी उपेक्षा की वजह से जान हथेली पर लेकर घर की ओर निकल पड़े हैं। क्या इन दुर्घटनाओं की कोई जिम्मेदारी सरकारों की नहीं बनती!

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