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संपादकीय: महंगाई की मार

खुदरा महंगाई दर बढ़ने का अर्थ है लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च बढ़ना। यह ठीक है कि पूर्णबंदी के दौरान वस्तुओं की बाजार तक पहुंच बाधित हो गई थी। पर पूर्णबंदी खुलने के बाद वही स्थिति नहीं रह गई। फिर बंदी को खुदरा महंगाई दर बढ़ने का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता।

Author Published on: July 15, 2020 3:33 AM
inflation, vegetables price, fruit priceखुदरा कीमतों में बढ़ोतरी से सरकार की चिंता बढ़ गई है।

खुदरा महंगाई दर ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि थोक महंगाई दर में गिरावट दर्ज हुई है, पर खुदरा महंगाई दर बढ़ कर रिजर्व बैंक की सीमा के पार पहुंच गई है। रिजर्व बैंक की कोशिश होती है कि खुदरा महंगाई दर दो से छह फीसद के बीच रहे। सरकार की मंशा के अनुसार वह इसे चार फीसद के आसपास रखने का प्रयास करता रहा है। पर जून महीने के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार यह छह प्रतिशत के ऊपर पहुंच गई है। बंदी की वजह से अप्रैल और मई की दरें दर्ज नहीं की जा सकीं।

ताजा आंकड़े भी सीमित दायरे के सर्वेक्षणों के आधार पर दर्ज किए गए हैं, पर इससे रिजर्व बैंक के लिए कोई राहत की बात नहीं। पिछले साल इसी महीने में दर्ज 3.18 फीसद की महंगाई दर की तुलना में ताजा दरें बहुत अधिक हैं। अब रिजर्व बैंक के सामने मुश्किल यह है कि वह अपनी ब्याज दरों में बदलाव कर महंगाई दर पर काबू पाने का प्रयास करे या फिर विकास दर बढ़ाने का। पिछले काफी समय से रिजर्व बैंक इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पा रहा है।

खुदरा महंगाई दर बढ़ने का अर्थ है लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च बढ़ना। यह ठीक है कि पूर्णबंदी के दौरान वस्तुओं की बाजार तक पहुंच बाधित हो गई थी। पर पूर्णबंदी खुलने के बाद वही स्थिति नहीं रह गई। फिर बंदी को खुदरा महंगाई दर बढ़ने का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता। खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी बंदी से पहले भी दर्ज की गई थी। फरवरी में यह छह फीसद से थोड़ा ही नीचे थी। तब कई अर्थशास्त्री मानने लगे थे कि भारत में मंदी का दौर है। दरअसल, जब खुदरा महंगाई दर का रुख लगातार ऊपर की तरफ और विकास दर नीचे की ओर बनी रहती है तो मंदी का दौर माना जाता है।

पिछले साल की तुलना में खुदरा महंगाई दर पर काबू पाना लगातार कठिन बना हुआ है। बेशक थोक महंगाई दर में कुछ राहत नजर आती है, पर उसमें भी खाद्य उत्पादन से जुड़े उद्योगों पर नजर डालें तो वहां महंगाई दर बढ़ी हुई ही दर्ज हुई है। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें बढ़ने के पीछे बड़ा कारण खेती-किसानी पर मौसम की पड़ने वाली मार को माना जाता है। पर पिछले कुछ महीनों में ऐसा कोई कारण नजर नहीं आया। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतें और बिजली उत्पादन बड़े कारण माने जाते हैं, पर इनमें भी कोई परेशानी नजर नहीं आई।

फलों और सब्जियों की कीमतों में मौसम और आपूर्ति में बाधा आदि का असर देखा जा सकता है, पर दालों, चावल, आटे जैसी रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमतें भी लगातार बढ़ी हैं, तो इसकी वजहें साफ हैं। यहां तक कि पिछले कुछ समय से न केवल शहरी, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी खुदरा महंगाई दर बढ़ी है। इसकी एक वजह तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे रहने के बावजूद सरकार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाती रही।

फिर जीएसटी लागू होने के बावजूद करों में संतुलन कायम नहीं हो पाया। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने विकास दर के बरक्स महंगाई पर काबू पाना चुनौतीपूर्ण बन गया है। उसने खुद साल भर तक कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोक दिया है। लोगों के सामने रोजगार का संकट है। वेतन में कटौती की जा रही है। ऐसे में लोगों पर महंगाई की मार चौतरफा पड़ने वाली है।

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