किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तभी सुदृढ़ मानी जाती है, जब विकास के साथ-साथ महंगाई भी नियंत्रण में रहे। अगर आवश्यक वस्तुओं के दाम अनियंत्रित तरीके से बढ़ते जाएं, तो आम जनता की बचत कम होने से उसकी क्रय शक्ति भी घट जाती है। इससे निवेश और बाजार की मांग प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यानी कीमतों में स्थिरता के बिना लंबे समय तक समावेशी और संतुलित विकास हासिल नहीं किया जा सकता।
देश में महंगाई के मोर्चे पर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इसी स्थिति की ओर इशारा करती है। सरकार की ओर से बीते सोमवार को जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, खाद्य वस्तुओं के दामों में लगातार बढ़ोतरी से जून में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 फीसद पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 3.93 फीसद थी। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने महंगाई दर को चार फीसद तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन मौजूदा आंकड़ा इससे आगे निकल गया है।
सरकार की ओर से अक्सर यह दावा किया जाता है कि महंगाई नियंत्रण में है और आवश्यक वस्तुओं के दाम आम आदमी की पहुंच में हैं। मगर, वर्तमान परिस्थितियों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या महंगाई को नियंत्रित करने की सरकार की नीतियां कारगर साबित नहीं हो पा रही हैं या फिर कीमतों को काबू करने की डोर को जान-बूझकर ढीला छोड़ देने की कोशिश की जा रही है?
खाद्य महंगाई का मई में 4.78 फीसद से बढ़कर जून में 5.32 फीसद पर पहुंच जाना वास्तव में चिंताजनक है। जब आरबीआई ने खुद महंगाई को चार फीसद के आसपास रखने का लक्ष्य निर्धारित किया है, तो फिर क्या वजह है कि यह आंकड़ा तेजी से ऊपर की ओर जा रहा है। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन इसका खमियाजा आम आदमी को अपनी जरूरतों और खर्च में कटौती के रूप में भुगतना पड़ रहा है। सरकार को इस बात पर गंभीरता से गौर करना चाहिए कि महंगाई की सबसे ज्यादा मार समाज के उस कमजोर तबके पर पड़ती है, जो दिनभर कड़ी मेहनत के बावजूद बमुश्किल अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर पाता है।
