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संपादकीयः भेदभाव के मंदिर

अपनी धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति की वजह से अगर किसी व्यक्ति को भेदभाव या छुआछूत जैसी स्थिति का शिकार होना पड़े तो मानवीयता की कसौटी पर यह उस समूची सामाजिक परंपरा को सवालों के कठघरे में खड़ा करता है।

Author August 1, 2018 3:13 AM
सवाल है कि धर्म और आस्था की अभिव्यक्ति के मामले में क्या कोई ऐसा विभाजन होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के पूजा करने से मंदिर या किसी भगवान की मूर्ति ‘अशुद्ध’ हो जाए!

अपनी धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति की वजह से अगर किसी व्यक्ति को भेदभाव या छुआछूत जैसी स्थिति का शिकार होना पड़े तो मानवीयता की कसौटी पर यह उस समूची सामाजिक परंपरा को सवालों के कठघरे में खड़ा करता है। यह समझना मुश्किल है कि आखिर किन वजहों से कोई समाज भेदभाव पर आधारित कुछ अमानवीय मान्यताओं के पालन को लेकर कोई भी तर्क सुनने को तैयार नहीं होता। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में हमीरपुर जिले के मुस्करा खुर्द गांव में भाजपा विधायक मनीषा अनुरागी प्राथमिक विद्यालय में परिधान वितरण कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं। वहीं कुछ लोगों ने उन्हें मंदिर के बारे में बताया तो वे वहां पूजा करने चली गर्इं। लेकिन उसके बाद गांव के लोगों की जैसी प्रतिक्रिया हुई, वह हैरान करने वाली है। मान्यता के मुताबिक उस मंदिर में किसी भी महिला के जाने पर इसलिए पाबंदी है कि इससे गांव में सूखा और अकाल की स्थिति आ जाएगी। इसलिए जब लोगों को पता चला तो उस मंदिर और पूरे परिसर को गंगाजल से धुलवा कर कथित रूप से शुद्ध किया गया और आपस में चंदा करके मंदिर की एक मूर्ति को इलाहाबाद के संगम में ‘पवित्र स्नान’ कराने के लिए भेजा गया।

सवाल है कि धर्म और आस्था की अभिव्यक्ति के मामले में क्या कोई ऐसा विभाजन होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के पूजा करने से मंदिर या किसी भगवान की मूर्ति ‘अशुद्ध’ हो जाए! अगर किसी परंपरा में इस तरह के भेदभाव मौजूद हैं तो यह सोचने की जरूरत है कि उसमें मानवीयता और बराबरी के लिए क्या जगह है! हाल ही में केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमित्र ने कहा था कि यह पाबंदी दलितों के साथ छुआछूत की तरह है। उसी दौरान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बाकायदा संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत महिलाओं का प्रार्थना करना संवैधानिक अधिकार है। मगर विडंबना यह है कि संवैधानिक प्रावधानों के बरक्स परंपराएं कई बार इस कदर हावी हो जाती हैं कि उसमें अधिकार भी खारिज कर दिए जाते हैं। मनीषा अनुरागी उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित राठ विधानसभा सीट से चुनी गई विधायक हैं। जब एक विधायक के मंदिर में जाने पर स्थानीय लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया हो सकती है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि अनुसूचित जाति के कमजोर पृष्ठभूमि के दूसरे लोगों को किन हालात का सामना करना पड़ता होगा।

समस्या यह भी है कि धर्म और आस्था के सवालों को लेकर हमारे राजनीतिक दल जरूरत से ज्यादा सक्रिय और संवेदनशील रहते हैं, लेकिन समाज में भेदभाव या छुआछूत के खिलाफ समानता के मूल्यों के प्रसार और इसके लिए लोगों को जागरूक करना उनकी फिक्र में शामिल नहीं होता। इसके अलावा, वैज्ञानिक चेतना का प्रचार-प्रसार सरकार का संवैधानिक दायित्व है। मगर इसे लेकर हमारी सरकारें कितनी लापरवाह रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले कुछ सालों से लगातार यह सवाल उठा है कि मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करना महिलाओं या दलितों का अधिकार है। लेकिन ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनमें कहीं किसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो कहीं दलित पृष्ठभूमि से आने वाले किसी व्यक्ति को। जबकि अगर किसी व्यक्ति को धर्म का हिस्सा माना जाता है तो उसे समान पूजा-पद्धति अपनाने और अपनी आस्था की अभिव्यक्ति का अधिकार होना चाहिए। इंसानियत और बराबरी का दावा करने वाले किसी भी धर्म, परंपरा या मान्यता में भेदभाव की गुंजाइश कैसे हो सकती है?

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