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संपादकीयः जवाबदेही का सवाल

सांसद निधि के इस्तेमाल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। यह गंभीर बात इसलिए है कि सांसद निधि का पैसा आम जनता के हित में होने वाले विकास कार्यों के लिए होता है।

Author September 18, 2018 1:28 AM
सांसद निधि के उपयोग को लेकर सवाल उठने की वजह यह भी रही है कि इस कोष के इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है।

सांसद निधि के इस्तेमाल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। यह गंभीर बात इसलिए है कि सांसद निधि का पैसा आम जनता के हित में होने वाले विकास कार्यों के लिए होता है। लेकिन हकीकत यह है कि इस मद का कितना पैसा कहां और कैसे खर्च होता है, यह कोई नहीं जानता। इसमें पारदर्शिता के अभाव की शिकायतें आम रही हैं। यह पता ही नहीं चल पाता कि सांसद अपने क्षेत्र में इस खास कोष से करवा क्या रहे हैं। ज्यादातर मामलों में देखने में आया है कि इस कोष का इस्तेमाल हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे कामों में करते हैं जो इसके अंतर्गत नहीं कराए जा सकते। इनमें घपले और भ्रष्टाचार की खबरें आती रही हैं। इसके अलावा, सांसद इस निधि से होने वाले खर्च का हिसाब-किताब तक नहीं देते। ये सब बातें सांसद निधि में घपले की आशंकाओं को जन्म देती हैं। इस साल की एक रिपोर्ट बताती है कि लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों ने विकास निधि का पांच हजार करोड़ रुपया खर्च नहीं किया है, जबकि दो सौ से ज्यादा सांसदों की विकास निधि की अगली किस्त जारी नहीं की गई है। सवाल है कि विकास कार्यों को लेकर क्या यह हमारे जनप्रनिनिधियों का उदासीन और लापरवाह रवैया है या फिर कुछ और?

दरअसल, सांसद निधि के उपयोग को लेकर सवाल उठने की वजह यह भी रही है कि इस कोष के इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है। इसीलिए केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने इस दिशा में कदम उठाते हुए एक ऐसा कानूनी ढांचा बनाने की पैरवी की है जो इस निधि के इस्तेमाल में सांसदों और अन्य संगठनों की जवाबदेही तय करे और हिसाब-किताब में पारदर्शिता सुनिश्चित कर सके। इसके लिए आयोग ने लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के दफ्तर को पत्र लिखा है। आयोग के समक्ष यह मामला तब आया जब दो आरटीआइ आवेदकों को सांसद निधि के इस्तेमाल के बारे में सूचना नहीं मिल पाई। आयोग ने इस बारे में सांख्यिकी और कार्यान्वयन मंत्रालय की उस रिपोर्ट का संज्ञान लिया, जिसमें कहा गया है कि अभी तक बारह हजार करोड़ का सांसद निधि कोष खर्च नहीं हो पाया है। इसलिए आयोग के अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया है कि जो कानूनी ढांचा बनाया जाए उसमें विशेष कर्तव्य, अनिवार्य पारदर्शिता, कर्तव्य उल्लंघन की परिभाषा की स्पष्ट व्याख्या हो और लापरवाही बरतने व नियमों का उल्लंघन करने के मामले में जवाबदेही तय हो।

गौरतलब है कि सरकार ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना की राशि यानी सांसद निधि पांच करोड़ रुपए सालाना कर दी थी। हालांकि इसके पीछे मंशा यही थी कि सांसद अपने-अपने इलाकों में तेजी से विकास कराएं और इस काम में उन्हें धन-संबंधी कोई अड़चन न आए। लेकिन असलियत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सांसद निधि के इस्तेमाल में जनप्रतिनिधि मनमानी करते हैं और इसका नतीजा भ्रष्टाचार के रूप में देखने को मिलता है। जो काम विधायक निधि से कराए जाते हैं उन्हें सांसद निधि के खर्च में दिखा दिए जाने तक की शिकायतें मिली हैं। इसके लिए जो फर्जीवाड़ा होता है, वह जगजाहिर है। अनेक मामलों में जनप्रतिनिधि इस कोष का इस्तेमाल सार्वजनिक कामों की आड़ में अपने निजी हितों के लिए कर लेते हैं। ऐसे बहुत कम उदाहरण देखने में आएंगे जिनमें इस निधि से स्थानीय स्तर पर कुछ ठोस काम हुए हों। सांसद निधि का धन जनता का ही होता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इसके इस्तेमाल में पारदर्शिता और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही क्यों नहीं तय होनी चाहिए!

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