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फ्रांस का जवाब

पेरिस में हुए आतंकी हमले के मद््देनजर फ्रांस ने अपने यहां संदिग्ध चरमपंथियों की तलाश में छापेमारी की, वहीं दो दिन बाद सीरिया में आतंकी ठिकानों पर बम बरसाए..
Author नई दिल्ली | November 17, 2015 22:09 pm

पेरिस में हुए आतंकी हमले के मद््देनजर फ्रांस ने अपने यहां संदिग्ध चरमपंथियों की तलाश में छापेमारी की, वहीं दो दिन बाद सीरिया में आतंकी ठिकानों पर बम बरसाए। फिलहाल कहना मुश्किल है कि आइएस के खिलाफ फ्रांस की सैन्य कार्रवाई का दायरा क्या होगा और यह कब तक चलेगा। लेकिन इस कार्रवाई को लेकर लगभग समूचे विश्व का रुख सकारात्मक ही दिखा है। वजह जाहिर है। पेरिस में हुआ आतंकी हमला, जिसमें एक सौ उनतीस लोग मारे गए, किसी ऐसे छोटे-से गुट का काम नहीं है जिसकी पहचान, ठिकाना और साधन-स्रोत आदि गुप्त हों, और उसके सुराग पाने और उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए किसी और सरकार से अपील करने की दरकार पड़े। पेरिस में हुए आतंकी हमले की जिम्मेवारी आइएस यानी इस्लामिक स्टेट ले चुका है। इस संगठन ने सीरिया तथा इराक के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर वहां अपना ‘इस्लामिक राज्य’ कायम कर रखा है। उसकी दहशतगर्दी का जवाब कैसे दिया जाए, जो किसी भी राज्य-सत्ता की संप्रभुता के दायरे में नहीं आता, न बाकी दुनिया की तनिक परवाह करता है न किसी विश्व-संस्था के प्रति जवाबदेह है। हमले की जिम्मेदारी लेने के अलावा आइएस ने यह भी कहा कि यह हमला अंतिम नहीं है, यह तो शुरुआत है। फिर, वह बाकी यूरोप को भी निशाना बनाने का इरादा जता चुका है। शेष विश्व भी आइएस को लेकर बुरी तरह सशंकित है। लिहाजा, फ्रांस की कार्रवाई पर व्यापक सहमति दिखती है। आतंकी हमले की भयावहता उजागर होते ही फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने इसे युद्ध की संज्ञा दी थी और शोक में डूबे अपने देश के संभलते ही उन्होंने वैसा ही कदम उठाया है जैसा युद्ध के जवाब में उठाया जाता है। इसमें कौन-कौन शामिल होंगे? क्या इसकी परिणति भी युद्ध जैसी ही होगी?

जो हो, इतना साफ है कि दुनिया के इतिहास में यह घड़ी 9/11 के फौरन बाद के दिनों जैसी है। तब अमेरिका ने तालिबान के खात्मे के लिए अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया था। अन्य नाटो देश भी उसके सहयोगी बने। तालिबान हुकूमत का अंत हो गया। लंबे समय तक अमेरिकी और कुछ नाटो देशों के सैन्यबल अफगानिस्तान में जमे रहे। पर तालिबान का वजूद अब भी कायम है। अफगानिस्तान में और उससे लगते पाकिस्तान के हिस्से में उसके आतंकी हमले जब-तब होते रहते हैं। यह भी दुनिया से छिपा नहीं है कि बहुत-से गुट, जो पहले अल-कायदा से जुड़े थे, आइएस में शामिल हो गए। पर आइएस की ताकत एक मायने में अल-कायदा और तालिबान से भी अधिक है। उसने पश्चिमी देशों में भी अपने समर्थक, सहयोगी और ‘कार्यकर्ता’ तैयार किए हैं, जो कि पेरिस हमले की बाबत चल रही जांच और धर-पकड़ से भी जाहिर है। आइएस ने इंटरनेट के सहारे आतंकवाद को एक विचारधारात्मक जामा भी पहनाया है। यही कारण है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए विश्व की एकजुटता की अपील करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा यह सवाल भी उठाते हैं कि आतंकवाद की जड़ें कहां हैं। ओबामा पहले यह सोचते थे कि आइएस सीरिया और इराक तक सिमटा रहेगा। पर अब वे नए सिरे से सोचने को विवश हुए हैं। बहुत-से मुसलिम भी आइएस की बर्बरता के शिकार हो चुके हैं। लिहाजा, ओबामा की टिप्पणी को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है, ताकि न सिर्फ आतंकवाद बल्कि उसे पैदा करने और पनपाने वाली सोच के प्रति भी सारी दुनिया अधिक से अधिक सचेत हो।

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