Reserve Bank stepped towards dealing with inflation - संपादकीयः महंगाई की चिंता - Jansatta
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संपादकीयः महंगाई की चिंता

रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों में फिर से बढ़ोतरी कर यह साफ कर दिया कि महंगाई से निपटना उसकी प्राथमिकता है। पिछले दो महीने में यह दूसरा मौका है जब केंद्रीय बैंक ने महंगाई पर काबू रखने के लिए यह कदम उठाया है।

Author August 2, 2018 2:55 AM
रिजर्व बैंक ने यह इशारा कर दिया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के कारण खाद्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।

रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों में फिर से बढ़ोतरी कर यह साफ कर दिया कि महंगाई से निपटना उसकी प्राथमिकता है। पिछले दो महीने में यह दूसरा मौका है जब केंद्रीय बैंक ने महंगाई पर काबू रखने के लिए यह कदम उठाया है। इससे पहले साढ़े चार साल में पहली बार जून के पहले हफ्ते में नीतिगत दरें बढ़ाई गई थीं। केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति पिछले दो दिन से इस बारे में सोच-विचार में लगी थी कि इतनी जल्दी फिर से नीतिगत दरें बढ़ाना उचित होगा या नहीं। लेकिन अंत में उसे कड़ा फैसला करना पड़ा। हालांकि पिछले कुछ समय से बाजार और अर्थशास्त्रियों से इस बात के संकेत आ रहे थे कि जिस तरह के हालात हैं, उनमें रिजर्व बैंक फिर से नीतिगत दरें बढ़ाने को मजबूर हो सकता है। बैंक ने रेपो और रिवर्स रेपो दर 0.25 फीसद बढ़ा दी है। यानी अब रेपो दर साढ़े छह फीसद और रिवर्स रेपो दर 6.25 फीसद हो गई है। मौद्रिक नीति समिति ने आने वाले महीनों में भी महंगाई बने रहने के संकेत दिए हैं। मुद्रास्फीति चार फीसद तक के दायरे में रहती है तो यह चिंता की बात नहीं होती। लेकिन जब यह चार फीसद से ऊपर जाने लगती है तो यह परेशानी का कारण बनना स्वाभाविक है।

जाहिर है, दो महीने के भीतर ही केंद्रीय बैंक के ऐसे सख्त कदम से व्यावसायिक बैंकों के लिए भी मुश्किलें बढ़ेंगी। दो महीने पहले ही व्यावसायिक बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाई थीं। अब फिर से बैंकों को ऐसा कदम उठाना पड़ सकता है। इसका सीधा असर यह होगा कि कर्ज महंगा होगा। जिन लोगों ने बैंक से घर, गाड़ी के लिए या किसी भी अन्य तरह का कर्ज ले रखा है, उन्हें अब ज्यादा ब्याज देना होगा। मासिक किस्त यानी ईएमआइ बढ़ेगी। व्यावसायिक बैंकों का कारोबार मुख्य रूप से कर्ज पर टिका होता है। ऐसे में अगर कर्ज महंगा होगा तो कर्ज लेने से भी लोग बिदक सकते हैं। मुद्रास्फाति को लेकर रिजर्व बैंक के अनुमान संकेत दे रहे हैं कि हालात जल्द सामान्य होते नहीं लगते। नीतिगत दर बढ़ने के फैसले से उद्योग भी अछूते नहीं रहेंगे। कर्ज महंगा होगा तो लागत बढ़ेगी और औद्योगिक वृद्धि पर असर पड़ेगा। अगर हालात लंबे समय तक ऐसे बने रहे तो उद्योगों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। रोजगार सृजन पर बुरा असर पड़ेगा। यानी कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।

रिजर्व बैंक ने यह इशारा कर दिया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के कारण खाद्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। बैंक का यह अनुमान भी चिंतित करने वाला है कि खुदरा मुद्रास्फीति के अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बढ़ कर पांच फीसद तक पहुंच सकती है। जाहिर है, महंगाई बनी रहेगी। हाल-फिलहाल इससे राहत के कोई आसार नजर नहीं हैं। हालांकि अभी तक कई राज्यों में मानसून ठीक रहा है, लेकिन कुछ राज्यों में पर्याप्त बारिश नहीं होने की वजह से सूखे का खतरा सामने है। इस साल में पेट्रोल-डीजल के दामों ने जो रिकार्ड बनाया, उसने भी महंगाई की आग में घी काम किया। पेट्रोल-डीजल के दाम में जरा भी तेजी आती है तो सबसे पहला असर माल-भाड़े और ढुलाई पर पड़ता है और इसका सीधा बोझ आम जनता की जेब पर आता है। महंगाई चाहे थोक मूल्य सूचकांक आधारित हो या फिर खुदरा में, असर तो बाजार और खरीदार पर ही पड़ता है। इसलिए हाल-फिलहाल जो हालात हैं उसमें महंगाई को साधने के लिए नीतिगत दरों में वृद्धि ही कारगर उपाय था।

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