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संपादकीयः कर्ज का संकट

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने अब तक जो राहत पैकेज जारी किए हैं, उनमें भी जोर कर्ज देने पर ही है। लेकिन सवाल है कि आखिर क्यों बैंक कर्ज नहीं दे रहे हैं और क्यों जरूरतमंद भी कर्ज लेने से बच रहे हैं।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने अब तक जो राहत पैकेज जारी किए हैं, उनमें भी जोर कर्ज देने पर ही है।

जरूरतमंदों को कर्ज देने के लिए व्यावसायिक बैंकों पर भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से जिस तरह दबाव बना रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि इस वक्त बैंक आसानी से कर्ज दे नहीं रहे हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान उधारी की दर में आई गिरावट भी इस बात को पुष्ट करती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अर्थव्यवस्था जिस संकट और अनिश्चतता के दौर से गुजर रही है, उसमें बैंक किसी भी तरह का जोखिम लेने से बच रहे हैं। इसलिए केंद्रीय बैंक ने व्यावसायिक बैंकों से एक बार फिर साफ-साफ कहा है कि वे जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरतेंगे तो खुद संकट में पड़ जाएंगे। कोरोना महामारी से बचाव के उपाय के तौर पर की गई पूर्णबंदी के कारण देश के छोटे-बड़े उद्योगों को जिस तरह से धक्का लगा है, उससे अर्थव्यवस्था के लिए वाकई गंभीर संकट खड़ा हो गया है। लाखों छोटे और मझौले उद्योग तो बंद हो गए हैं। हालत यह है कि लोग अपना दोबारा से काम शुरू कर सकें, इसके लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं है। इसलिए रिजर्व बैंक का जोर ऐसे उद्योगों और व्यक्तियों को कर्ज मुहैया कराने पर है।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने अब तक जो राहत पैकेज जारी किए हैं, उनमें भी जोर कर्ज देने पर ही है। लेकिन सवाल है कि आखिर क्यों बैंक कर्ज नहीं दे रहे हैं और क्यों जरूरतमंद भी कर्ज लेने से बच रहे हैं। अगर बैंक कर्ज नहीं देंगे और लोग व उद्योग कर्ज लेने से बचेंगे, तो बाजार में नगदी का प्रवाह का कैसे बनेगा? केंद्रीय बैंक ने समय-समय पर नीतिगत दरों में जो कटौती की है, उसका मकसद ही ब्याज दरों को नीचे लाना है, ताकि कर्ज सस्ता हो और कर्ज लेने वाले आगे आएं। लेकिन इस वक्त कर्ज देने वाले और लेने वाले जिन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, उनमें एक बड़ा संकट बाजार में मांग नहीं होना है। पूर्णबंदी में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं और उससे भी बड़ी तादाद उन लोगों की है जिनके वेतन में भारी कटौती हो रही है। ऐसे में कोई कैसे घर, गाड़ी या निजी आवश्यकता के लिए कर्ज लेने की सोच सकता है! हालत यह है कि ज्यादातर छोटे-मझौले उद्योग पहले से भारी कर्ज में दबे पड़े हैं। वे ऐसे में और कर्ज लेकर नई आफत गले में क्यों डालेंगे? उद्योग पहले ही से पुराने कर्जों की माफी और पुनर्गठन की मांग कर रहे हैं।

व्यावसायिक बैंकों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे पहले से ही एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैं। हालांकि यह स्थिति बैंकों के अपने कुप्रबंधन और कर्ज बांटने में घोर अनियमितता के कारण ही उत्पन्न हुई है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि राजनीतिक दबावों में दिए गए कर्जों की वसूली आसान नहीं होती। कर्ज वसूली की कानूनी प्रक्रिया भी इतनी लंबी और जटिल है कि वर्षों की लड़ाई के बाद भी कर्ज के मामूली हिस्से की वसूली की संभावना नहीं रह जाती। कर्ज बांटने से भी ज्यादा बड़ी जरूरत बाजार में मांग पैदा करने की है। जब तक लोगों के पास रोजगार नहीं होगा और हाथ में पैसा नहीं आएगा, तो क्रयशक्ति भी नहीं बढ़ेगी। इसके अलावा, जिन लोगों के पास पैसे हैं भी, वे अनिश्चितता के खौफ की वजह से खर्च करने से घबरा रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का भरोसा बहाल करना फिलहाल केंद्रीय बैंक, व्यावसायिक बैंकों और सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती है।

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