आरक्षण बनाम आय

सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का मसला लंबे समय से ऐसी स्थितियों के बीच फंसा रहा है, जिसमें शायद अब तक पूरी स्पष्टता नहीं आ पाई है।

सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का मसला लंबे समय से ऐसी स्थितियों के बीच फंसा रहा है, जिसमें शायद अब तक पूरी स्पष्टता नहीं आ पाई है। हालांकि सरकार ने अपनी सुविधा के मुताबिक भिन्न सामाजिक वर्गों की पहचान और उसके मद्देनजर आरक्षण की व्यवस्था की। आर्थिक रूप से कमजोर तबकों यानी ईडब्लूएस के लिए दस फीसद आरक्षण लागू करने का कदम भी उसी के तहत उठाया गया, जिसे इस व्यवस्था को ज्यादा समावेशी बनाने के विचार का नतीजा बताया गया था।

इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज में किन्हीं वजहों से पीछे रह गए समुदायों को आगे लाने के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत होती है, मगर यह भी देखा जाता है कि इस सुविधा का बेजा इस्तेमाल न हो। शायद यही वजह है कि समाज के अन्य पिछड़े वर्ग के लिए सत्ताईस फीसद आरक्षण के बाद जब सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर माने गए हिस्से के लिए दस फीसद आरक्षण लागू हुआ तब उसमें भी ओबीसी की तरह ही आय की एक सीमा निर्धारित की गई। मगर अनेक वजहों से यह आय सीमा विवाद के केंद्र में रही।

हाल में नीट के जरिए मेडिकल दाखिले में ईडब्लूएस को मिलने वाले आरक्षण में आठ लाख रुपए की आय सीमा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में साफ किया कि वह ईडब्लूएस के आरक्षण में क्रीमी लेयर के लिए आठ लाख रुपए की सालाना आय सीमा पर फिर से विचार करेगी और इसे नए सिरे से तय किया जाएगा। फिलहाल अगले चार हफ्ते तक नीट में प्रवेश के लिए काउंसिलिंग नहीं होगी। जब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में सामान्य जातियों को आरक्षण देने का प्रश्न उठा था, तब उसका समाधान इस रूप में किया गया था कि आठ लाख रुपए वार्षिक आय सीमा वाले अभ्यर्थियों को इस लाभ के दायरे में माना जाएगा। सवाल है कि आखिर आय सीमा के निर्धारण और उसके मुताबिक आरक्षण देने के संदर्भ में अक्सर विवाद क्यों खड़ा हो जाता है!

सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए जब सत्ताईस फीसद आरक्षण का प्रावधान किया गया था, तब उसमें भी क्रीमी लेयर के तहत आर्थिक रूप से सक्षम माने गए हिस्से को इस लाभ के दायरे से बाहर रखा गया। तब भी आय सीमा आठ लाख रुपए थी। अब विवाद का पक्ष यह उभरा है कि क्या सामान्य वर्ग और ओबीसी तबके के लिए आरक्षण की व्यवस्था में आर्थिक सीमा के संदर्भ में एक ही पैमाने को आधार बनाया जा सकता है! अगर ऐसा है तो आरक्षण का वर्ग अलग-अलग होने का औचित्य क्या है!

इस मसले पर तस्वीर साफ करना सरकार के हाथ में है कि वह ओबीसी और सामान्य वर्ग के भीतर आरक्षण की सुविधा प्राप्त वर्गों को लेकर क्या दृष्टि रखती है। यों आरक्षण के मसले पर मुख्य बिंदु यही रहा है कि इस व्यवस्था के जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों की तंत्र में भागीदारी सुनिश्चित कराई जाएगी। सामान्य वर्गों के कमजोर हिस्से के उत्थान के लिए देश में आर्थिक सहायता और अवसर मुहैया कराने वाले अनेक कार्यक्रम हैं। लेकिन नीट में ईडब्लूएस के लिए निर्धारित आय सीमा पर उठे सवाल ने एक बार फिर इस मसले पर नई जद्दोजहद खड़ी की है। अब देखना है कि केंद्र सरकार ने इस पर पुनर्विचार की जो बात कही है, उसके मुताबिक इसका क्या नया स्वरूप सामने आता है।

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