आक्रोश बनाम अनुशासन

शायद यह पहली बार है जब किसी परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर छात्र इस कदर उग्र हो गए।

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शायद यह पहली बार है जब किसी परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर छात्र इस कदर उग्र हो गए। रेलवे भर्ती बोर्ड की अव्यावहारिक पहल के चलते यह विवाद पैदा हुआ और छात्र आंदोलन ने विस्फोटक रूप ले लिया। अच्छी बात है कि रेल मंत्रालय ने इस मामले को बहुत समझदारी से संभाला और भर्ती परीक्षा को स्थगित करने का आदेश दे दिया। मगर पिछले तीन दिनों में आंदोलनरत छात्रों ने रेलवे संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचा दिया। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में पुलिस ने जिस तरह छात्रों के खिलाफ दमन का रास्ता अपनाया, उससे सरकार की छवि भी खराब हुई है।

इन घटनाओं ने फिर से रेखांकित किया है कि सरकारें आखिर रोजगार के मसले पर पारदर्शी और व्यावहारिक रुख क्यों नहीं अख्तियार कर पातीं, वे छात्रों को उकसाने वाले फैसले क्यों करती देखी जाती हैं। रेलवे के विभिन्न वर्गों में भर्ती का विज्ञापन तीन साल पहले निकाला गया था। उसकी परीक्षा को टाला जाता रहा, तब उसके लिए भी छात्रों ने व्यापक आंदोलन चलाया था। फिर परीक्षा आयोजित की गई, मगर उसमें योग्यता का वर्गीकरण ठीक से नहीं किया गया, जिसके चलते परीक्षा परिणाम में एक ही विद्यार्थी को चार-चार पदों के लिए योग्य मान लिया गया। इस पर स्वाभाविक ही विद्यार्थी आक्रोशित हुए।

पहले रेलवे भर्ती परीक्षा में अलग-अलग श्रेणियों के लिए योग्यता के आधार पर अलग-अलग पर्चे तैयार किए जाते थे। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसमें दुहराव से बचने के लिए रेलवे बोर्ड ने कहा कि वह बीस गुना अधिक नतीजे देगी, मगर उसने घोषित संख्या से आधे प्रत्याशियों को ही योग्य घोषित किया। इससे भी लाखों विद्यार्थी ठगा हुआ महसूस करने लगे। अभी छात्र इसका विरोध कर ही रहे थे कि बोर्ड ने दूसरे चरण की परीक्षा घोषित कर दी। इससे छात्रों की नाराजगी विस्फोटक हो गई। प्रतियोगी परीक्षाएं इसीलिए कराई जाती हैं कि उनके आधार पर सर्वश्रेष्ठ प्रत्याशियों की छंटाई में आसानी होगी। मगर इन परीक्षाओं का एक वैज्ञानिक और पारदर्शी आधार तैयार किया जाता है, जो कि रेलवे बोर्ड ने नहीं किया।

छात्रों में असंतोष का असल कारण वही बना। छिपी बात नहीं है कि रेलवे भर्ती में प्रतियोगी परीक्षाओं के बावजूद सिफारिश और घूस का बोलबाला देखा जाता है। ऐसे में अगर बुनियादी स्तर पर ही रेलवे भर्ती बोर्ड टालू ढंग से परीक्षाएं आयोजित करेगा, तो विवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा ही। अब रेल मंत्रालय ने इस झगड़े को खत्म करने के लिए रेलवे भर्ती बोर्डों को जांच और पारदर्शी तरीके से परीक्षाएं आयोजित करने का आदेश दिया है। मगर इसमें होने वाला विलंब छात्रों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न की तरह बना रहेगा।

सरकारी महकमों में बड़े पैमाने पर पद खाली हैं, मगर सरकारें उन्हें भरने की प्रक्रिया शुरू नहीं करतीं, जिसे लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं। अगर कुछ विभागों में रिक्तियां निकलती भी हैं, तो उनकी प्रक्रिया इतनी विलंबित कर दी जाती है कि अभ्यर्थी वर्षों उसके इंतजार में बैठे रहते हैं। फिर भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी कई विभागों में चयनित अभ्यर्थियों को पदस्थापना पत्र देने में कई साल लगा दिए जाते हैं। इन सभी को लेकर छात्र आंदोलन करते देखे जाते हैं। फिर उन्हें काबू में करने के लिए पुलिसिया बर्बरता का सहारा लिया जाता है। रोजगार के मुद्दे पर युवक पहले से असंतोष से भरे हुए हैं, तिस पर सरकारी विभागों की ऐसी अव्यावहारिकता उन्हें और क्षोभ से भर देती है।

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