ताज़ा खबर
 

आस्था बनाम आहार

धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बिठाना हमेशा से जटिल और संवेदनशील मसला रहा है। अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की जीवनचर्या से लेकर खान-पान की आदतें तक एक-दूसरे से भिन्न हैं।

Author September 12, 2015 9:41 AM

धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बिठाना हमेशा से जटिल और संवेदनशील मसला रहा है। अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की जीवनचर्या से लेकर खान-पान की आदतें तक एक-दूसरे से भिन्न हैं। आपसी सौहार्द की स्थिति में हर समुदाय दूसरे धर्म को मानने वालों की आस्था का सम्मान करते हुए उनके बीच प्रचलित आचार-व्यवहार और उनकी जरूरतों का खयाल रखता है। मगर इस आम रिवायत को जब राजनीतिक दल, सत्ता या प्रशासन बाध्यकारी बनाने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर इससे प्रभावित समुदायों में न सिर्फ असंतोष पैदा हो जाता, बल्कि आपसी सौहार्द पर भी इसकी आंच आती है।

इसका ताजा उदाहरण मुंबई में चल रहा विवाद है, जिसमें पहले भाजपा के प्रभुत्व वाली मीरा-भायंदर नगरपालिका ने जैन समाज के पर्यूषण पर्व के मद्देनजर दस से अठारह सितंबर के बीच मांस की बिक्री पर रोक लगा दी। फिर भाजपा विधायकों के कहने पर मुंबई महानगरपालिका ने भी इस दौरान पशु-पक्षियों का मांस बेचने पर पाबंदी लगा दी। जाहिर है, जैन समाज के पर्यूषण पर्व को देखते हुए दूसरे समुदायों के जो लोग सौहार्दवश मांस नहीं खाने का फैसला करते होंगे, उनके बीच इसी बात को खुद पर थोपे जाने को लेकर नाराजगी फैली।

सवाल है कि क्या अलग-अलग समुदायों के बीच सौहार्द को अचानक दूरी और नाराजगी में बदल देने की जिम्मेदारी भाजपा नेताओं-कार्यकर्ताओं पर नहीं जानी चाहिए? सालों से सहज तरीके से सद्भाव के साथ मनाए जाने वाले पर्यूषण पर्व को आखिर किन वजहों से भाजपा नेताओं ने विवाद का विषय बना दिया? मुंबई में इस विवाद के बाद अब भाजपा शासित छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और जम्मू-कश्मीर में भी मांस-मछली की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

किसी भी समाज में जीवन-शैली, रोजमर्रा के आचार-व्यवहार और खानपान की जरूरतें या आदतें लंबे समय में विकसित होती हैं। वे बदलती भी रहती हैं। कई बार धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भी खानपान का पैमाना निर्धारित होता है। इसमें कुछ खास खाद्य पदार्थों को वर्जित मान लिया जाता है। लेकिन संभव है कि वही खाद्य-पदार्थ भिन्न मत या धर्म के अनुयायियों के बीच सामान्य हों। यानी अपनी मान्यताओं के हिसाब से खानपान का चुनाव व्यक्ति की निजी पसंद पर निर्भर करता है।

एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाज और सत्ता को इस पसंद में दखल नहीं देना चाहिए। जहां तक किसी के मांसाहार से दूसरे की भावनाओं के आहत होने का सवाल है, यह मसला इतना जटिल और संवेदनशील है कि सभी मतों और मान्यताओं वाले लोगों की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है। फिर संभव है कि सभी धर्मों के लोग अपने से भिन्न समुदाय के किसी खास आचरण से अपनी भावना आहत होने का दावा करने लगे। तब समाज में विद्वेष का अंदाजा लगाया जा सकता है। पर लगता है कि भाजपा ने भावनाओं के आहत होने को ही अपनी राजनीति की सुविधा और हथियार बना लिया है। बेहतर हो कि खानपान के मसले को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद पर छोड़ दिया जाए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App