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रावत को राहत

असल मुद्दा राष्ट्रपति शासन संबंधी निर्णय प्रक्रिया का है जिसमें केंद्र का दामन पाक-साफ नजर नहीं आता है।

Author नई दिल्ली | April 22, 2016 2:56 AM
हरीश रावत।(फाइल फोटो)

गुरुवार को आए नैनीताल उच्च न्यायालय के फैसले से केंद्र को तगड़ा झटका लगा है। न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन हटा कर मुख्यमंत्री पद पर हरीश रावत की बहाली कर दी। अलबत्ता उन्हें उनतीस अप्रैल को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना होगा। जाहिर है, यह रावत की जीत है जिन्होंने अपनी बर्खास्तगी और राष्ट्रपति शासन के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। रावत को फिलहाल राहत तो मिल गई है, पर यह गांरटी के साथ नहीं कहा जा सकता कि वे पद पर बने ही रहेंगे। अगर वे बहुमत की परीक्षा में खरे नहीं उतरे तो भाजपा कांग्रेस के बागी विधायकों को साथ लेकर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है। पर संभावनाओं के इस खेल में बाजी किसके हाथ लगेगी, यह उतना अहम सवाल नहीं है। ज्यादा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उत्तराखंड प्रकरण में ऐसा क्या हुआ कि अदालत बिफर पड़ी।

गुरुवार से पहले भी अदालत ने दो बार केंद्र को खरी-खोटी सुनाई थी। अपनी एक टिप्पणी में केंद्र के महाधिवक्ता से पीठ ने कहा कि आप लोकतंत्र की जड़ें काट रहे हैं। दूसरी अहम टिप्पणी में कहा कि राष्ट्रपति के फैसले की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है। इन दोनों टिप्पणियों से ही संकेत मिल गए थे कि अदालत का रुख क्या है और अंतत: उसका फैसला क्या होगा। पर सवाल है कि केंद्र ने अपने निर्णय को राष्ट्रपति के निर्णय की तरह क्यों पेश किया? राष्ट्रपति शासन औपचारिक तौर पर भले राष्ट्रपति की मंजूरी से लगाया जाता है, पर इसका निर्णय तो केंद्र सरकार करती है और वही जवाबदेह होती है। उसने जवाबदेही से बचने की कोशिश क्यों की? फिर, राज्यपाल की रिपोर्ट के हवाले ने भी केंद्र को कठघरे में खड़ा किया है।

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केंद्र सरकार यही दलील दोहराती आ रही थी कि राष्ट्रपति शासन इसलिए लगाया गया कि हरीश रावत सरकार अल्पमत में आ गई थी; अठारह मार्च को विनियोग विधेयक पारित किए जाने के समय भाजपा और कांग्रेस के बागी विधायकों की मत विभाजन की मांग विधानसभा अध्यक्ष ने नहीं मानी। लेकिन जैसा कि सुनवाई कर रहे पीठ ने कहा, राज्यपाल ने राष्ट्रपति को भेजी अपनी रिपोर्ट में इस बात का कोई जिक्र नहीं किया था कि पैंतीस विधायकों ने या कांग्रेस के बागी विधायकों ने मत विभाजन की मांग की थी। फिर, राष्ट्रपति शासन क्यों लागू हुआ, वह भी विश्वास-मत के लिए राज्यपाल की ओर से निर्धारित तारीख से ऐन एक दिन पहले! इसलिए असल मुद्दा यह नहीं है कि हाईकोर्ट के फैसले के फलस्वरूप राष्ट्रपति शासन हट जाने का लाभ किसको होगा, किसकी सरकार बनेगी।

असल मुद्दा राष्ट्रपति शासन संबंधी निर्णय प्रक्रिया का है जिसमें केंद्र का दामन पाक-साफ नजर नहीं आता है। धारा तीन सौ छप्पन के दुरुपयोग के लिए भाजपा कांग्रेस को हमेशा कोसती आई थी। विपक्ष में रहते हुए वह राज्य सरकारों के अधिकारों और संघीय स्वरूप के पक्ष में बराबर मुखर रही। पर लगता है वह अपने पहले के रुख से उलट राह पर चल पड़ी है। विपक्ष में रहने के दरम्यान और सत्ता में आने के बाद अलग-अलग रुख के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। पर यह मामला कहीं ज्यादा गंभीर है क्योंकि यह एक चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने से पहले बहुमत साबित करने का मौका न देने बल्कि मौका घोषित करके भी न देने और इस तरह एक गंभीर संवैधानिक तकाजे को ताक पर रख देने का है।

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