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संपादकीयः हिंसा पर लगाम

हिंसक भीड़ के हमलों और हत्या जैसी घटनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख दिखाया है। शीर्ष अदालत ने राज्यों से कहा है कि सामूहिक हिंसा से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

Author July 5, 2018 06:55 am
बच्चों की चोरी और मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है। हर साल इसके आंकड़े कुछ बढ़े हुए ही दर्ज होते हैं, पर तमाम दावों के बावजूद प्रशासन इस पर नकेल कसने में नाकाम रहा है।

हिंसक भीड़ के हमलों और हत्या जैसी घटनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख दिखाया है। शीर्ष अदालत ने राज्यों से कहा है कि सामूहिक हिंसा से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों, खासकर हाल के कुछ महीनों में हिंसक भीड़ ने कई निर्दोष लोगों की जान ले ली। इन घटनाओं से लगता है कि कहीं भी कानून-व्यवस्था ठीक नहीं है। मामूली-सी घटना, बात या अफवाह पर ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। गोरक्षा, गोमांस, बच्चा चोरी जैसी बातों को लेकर अफवाहें इतनी तेजी से फैल जाती हैं कि जो सामने आता है वही हिंसक भीड़ का शिकार हो जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से यह उम्मीद तो बंधती है कि राज्य सरकारें अब हरकत में आएंगी और कानून हाथ में लेने वाले ऐसे उन्मादियों से सख्ती से निपटेंगी। जिस तेजी से भीड़ का उन्माद बढ़ा है, उससे ऐसा खौफ पैदा हो गया है कि कोई नहीं जानता किस बहाने वह भीड़ का शिकार हो जाए। ऐसा भी नहीं कि किसी राज्य विशेष में ही ऐसी घटनाएं हुई हों। भीड़ तंत्र का ऐसा आतंक त्रिपुरा से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से राजस्थान तक में देखने को मिल रहा है। हाल में महाराष्ट्र के धुले जिले में बच्चा चोर गिरोह के शक में भीड़ में पांच लोगों को पीट-पीट कर मारा डाला। इस साल मई से अब तक भीड़ की पिटाई से उन्नीस लोग मारे जा चुके हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि राज्य सरकारें ऐसी घटनाओं से निपटने में नाकाम रही हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन पंगु साबित हो रहा है। ऐसे में सवाल है कि आखिर ये घटनाएं रुकेंगी कैसे? ऐसा करने वालों पर लगाम कैसे लगे? इसीलिए सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकारों को ऐसी भीड़ से सख्ती से पेश आने को कहा है। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले खंडपीठ ने राज्यों को निर्देश जारी किए हैं, जिसमें साफ कहा गया है कि भीड़ अगर किसी को पीट-पीट कर मार डालती है तो यह सीधे-सीधे हत्या का मामला है, जो कि अपराध है। अदालत ने इसे कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं माना, बल्कि भीड़ के ऐसे आचरण को हिंसा करार दिया है। भीड़ द्वारा पैदा की गई यह अराजक स्थिति है, जिसमें वह कानून अपने हाथ में लेकर खुद ही फैसला करने पर आमादा हो जाती है। इस खौफनाक और घातक प्रवृत्ति से निपटने के लिए राज्यों की मशीनरी को चाक-चौबंद होने की जरूरत है।

भीड़ तंत्र के ऐसे बढ़ते हमले दरअसल असामाजिक तत्त्वों की करतूतें हैं, जो अपने हाथ में कानून लेने से जरा भी नहीं हिचकते। अब तक भीड़ द्वारा हिंसा के जो मामले सामने आए हैं उनके पीछे सबसे बड़ा कारण अफवाह फैलना रहा है। ज्यादातर मामलों में अफवाहें सोशल मीडिया, खासतौर से वाट्सऐप के जरिए फैली हैं। सरकार ने अब वाट्सऐप से ऐसे संदेशों पर रोक लगाने को कहा है, जो अफवाह फैलाते हों, जिनसे किसी भी तरह की हिंसा के फैलने का अंदेशा हो। यह कदम कितना कारगर होगा, यह देखने वाली बात है। आखिर क्या कारण हैं कि भारतीय समाज में एक खास तरह का भीड़ तंत्र पैदा होता जा रहा है, जो कानून-व्यवस्था और समाज दोनों के लिए चुनौती बन गया है? ये हालात गंभीर खतरे की ओर संकेत करते हैं। क्या इक्कीसवीं सदी के भारत में भीड़ खुद न्याय इसलिए कर रही है कि उसका शासन तंत्र से भरोसा खत्म हो गया है!

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