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संपादकीयः सेना का कायापलट

भारतीय सेना को आधुनिक बनाने की दिशा में जिस तेजी के साथ अब बढ़ा जा रहा है, वह काफी पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था।

भारतीय सेना को आधुनिक बनाने की दिशा में जिस तेजी के साथ अब बढ़ा जा रहा है, वह काफी पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था। दिल्ली में सेना के कमांडरों की एक महत्त्वपूर्ण बैठक कर सेनाध्यक्ष ने साफ कहा कि अब सेना का पुनर्गठन किए जाने और उसे आधुनिक हथियारों से लैस करने की तत्काल जरूरत है। आज तकनीक और प्रौद्योगिकी के जमाने में दुनिया के तमाम देश जिस तरह के अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित हो रहे हैं, उनके मुकाबले भारत अभी काफी पीछे है। कहने को भारतीय फौज की गिनती दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना के तौर पर होती है, लेकिन अब सैन्य संख्याबल के बजाय अत्याधुनिक हथियारों की अहमियत ज्यादा है। भविष्य में जिस तरह के युद्धों की परिकल्पना की जा रही है, उनमें सैनिकों से ज्यादा भूमिका हथियारों की होगी। जबकि भारतीय सैन्य व्यवस्था अभी भी पुराने ढर्रे वाली है, जिसमें सैनिकों की तादाद जरूरत से ज्यादा है। सेना प्रमुख ने संकेत दिया है कि अगले पांच साल में डेढ़ लाख सैनिकों की कटौती की जाएगी और इससे जो पैसा बचेगा, उसका इस्तेमाल हथियारों की खरीद में होगा।

देश के रक्षा बजट का आधा हिस्सा यानी पचास फीसद थलसेना के लिए होता है। लेकिन शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि सेना की जरूरत के लिए बजट की रकम पर्याप्त साबित हुई हो। लंबे समय से सेना की मांग रही है कि उसका बजट बढ़ाया जाए। लेकिन हमेशा ही उसे काफी कम पैसा मिलता है। धन के अभाव में सेना को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसकी एक वजह यह भी है कि बजट का अस्सी फीसद से ज्यादा हिस्सा सिर्फ सैनिकों की तनख्वाह पर खर्च हो जाता है। ऐसे में हथियार खरीदने के लिए पैसे नहीं बचते। सैन्य बजट में कमी और हथियारों की कमी को लेकर संसदीय समिति पहले ही चिंता जता चुकी है। समिति ने इस साल के लिए भी सेना के हिस्से में आबंटित बजट को नाकाफी बताया और साफ कहा कि सेना को आधुनिकीकरण के लिए कुल 21338 करोड़ रुपए दिए गए हैं। जबकि पहले से चल रही सवा सौ परियोजनाओं को जारी रखने के लिए उसे 29033 करोड़ रुपए की जरूरत है। इसलिए सेना अपने आधुनिकीकरण के लिए कुछ भी नहीं कर सकती। सेना के पास अड़सठ फीसद हथियार और उपकरण पुराने हैं। ऐसे में सवाल है कि हमारी सेना कैसे आधुनिक बनेगी?

सेना को अत्याधुनिक बनाने की जरूरत इसलिए भी है कि हमारे दो पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन सैन्य ताकत में कहीं कमजोर नहीं हैं और दोनों परमाणु शक्ति से संपन्न हैं। चीन और पाकिस्तान दोनों से ही भारत को समय-समय पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान ने कश्मीर को मुद्दा बना कर क्षेत्र में अशांति पैदा कर रखी है और पिछले ढाई दशक से भारत के खिलाफ एक तरह का छायायुद्ध चलाया हुआ है। सीमापार से आतंकवादियों को भारत में घुसपैठ करा कर आतंकी हमलों को अंजाम देने की तमाम घटनाएं भारत ने झेली हैं। मुंबई का आतंकी हमला हो या फिर पठानकोट और उड़ी के सैन्य शिविरों पर हमले, सबमें पाकिस्तान का हाथ साबित हो चुका है। इसी तरह चीन के साथ पुराना सीमा विवाद है। भारत-चीन की सीमा भी हजारों किलोमीटर लंबी है। भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में चीन और पाकिस्तान के साथ लगी सीमाओं पर भारत को खासतौर से सैन्य बल बढ़ाने और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने की जरूरत है। इन दोनों सीमाई क्षेत्रों में अर्द्धसैनिक बलों के साथ थलसेना के जवान ही मोर्चा संभालते हैं। जाहिर है, अगर हमारे सैनिक अत्याधुनिक हथियारों से लैस नहीं होंगे तो दुश्मन से क्या टक्कर लेंगे!

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