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कठघरे में जांच

समूचे देश ने पहले दौर में कोरोना विषाणु का कहर झेला था और उसकी त्रासद यादें कायम ही थीं कि दूसरी लहर ने उससे ज्यादा गहरा दंश दिया।

सांकेतिक फोटो।

समूचे देश ने पहले दौर में कोरोना विषाणु का कहर झेला था और उसकी त्रासद यादें कायम ही थीं कि दूसरी लहर ने उससे ज्यादा गहरा दंश दिया। इसकी मुख्य वजह कोरोना से बचाव के मानकों का पालन करने में बरती गई लापरवाही को माना गया। अफसोस यह कि जिस समय ऐसे आकलन सामने आ रहे थे, उसी समय खुद कुछ राज्य सरकारों ने कोरोना के प्रति सावधानी के नियम-कायदों को हल्के में लिया। विषाणु के संक्रमण का क्रम तोड़ने के मकसद से ही पूर्णबंदी जैसी सख्ती बरती गई, लेकिन इस बीच भी धार्मिक आयोजन के नाम पर लोगों के जमावड़े को नियंत्रित नहीं किया जा सका।

हाल ही में उत्तराखंड में हरिद्वार के कुंभ के दौरान लाखों लोगों की जुटान के मौके पर तमाम सवाल उठाए गए थे कि इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन ऐसे सवालों पर ध्यान देना सरकार ने जरूरी नहीं समझा। बाद में जब कुंभ में आए लोगों की कोरोना जांच की प्रक्रिया शुरू हुई तो कायदे से संक्रमितों की पहचान और उनकी सही रिपोर्ट को ध्यान में रख कर बचाव के हर इंतजाम किए जाने चाहिए थे। लेकिन जिस तरह कोरोना जांच में ही घोटाले की खबरें आर्इं, उसने समूचे देश में इस बात को लेकर चिंता पैदा की है कि अगर कुंभ में संक्रमित हुआ व्यक्ति अनजाने में लौट कर अपने घर गया होगा तो वहां किस तरह के खतरे पैदा हो सकते हैं।

गौरतलब है कि कुंभ मेले में पहुंचे लोगों की आरटी-पीसीआर और एंटीजन जांच की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए सरकार ने एक निजी कंपनी के साथ करार किया था, जिसने कई लाख लोगों की जांच की। लेकिन इस क्रम में भारी तादाद में वैसे लोगों की कोविड निगेटव रिपोर्टें जारी कर दी गर्इं, जिनमें किसी की जांच ही नहीं हुई थी। जब इस मामले का खुलासा हुआ, तब इस सवाल ने ज्यादा चिंता पैदा की कि कितनी बड़ी तादाद में संक्रमित लोग हुए होंगे और उसका असर क्या पड़ेगा।

इससे त्रासद और क्या हो सकता है कि जो सरकार आम लोगों के लिए पूर्णबंदी जैसी सख्ती इसलिए लागू करती है ताकि संक्रमण का दायरा कम किया जा सके, वह कोरोना जांच के मामले में इतनी बड़ी लापरवाही को लेकर बेफिक्र रहती है। अब मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार ने समूचे मामले की पड़ताल विशेष जांच दल से कराने की बात की है। हालांकि फिलहाल इसमें संबंधित कंपनी से लेकर सरकार में ऊंची पहुंच रखने वाले राजनीतिकों की बहुस्तरीय मिलीभगत के संकेत सामने आ रहे हैं और जांच के बाद ही असली दोषी कठघरे में किए जा सकेंगे, लेकिन इतना तय है कि इस व्यापक लापरवाही और उससे पैदा जोखिम के लिए आखिरी तौर पर सरकार और उसका तंत्र ही जिम्मेदार है।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदले जाने के बाद उम्मीद की गई थी कि अब शासन-प्रशासन के कामकाज और खासतौर पर कोरोना से निपटने के मामले में जनता को थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन पहले कुंभ के आयोजन की लापरवाही, फिर वहां संक्रमण की जांच तक में घोटाला यह साबित करने के लिए काफी है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है! समूचे देश में फिलहाल कोरोना विषाणु के संक्रमण से थोड़ी राहत जरूर दिख रही है, लेकिन यह कब किस शक्ल में पहले से ज्यादा खतरनाक तरीके से उभर जाए, कहा नहीं जा सकता। हालांकि इसकी आशंकाएं लगातार जताई जा रही हैं कि आने वाले वक्त में इसकी तीसरी लहर एक बार फिर कहर बरपा सकती है। इसकी रोकथाम के लिए जो सबसे जरूरी मानक हैं, उसका पालन करने में कोताही ने आज हालत यह कर दी है कि इस महामारी को लेकर सभी हर वक्त एक आशंका से घिरे रहते हैं।

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