X

संपादकीयः एनपीए की हकीकत

बैंकों का कर्ज क्यों डूबता चला गया और वे कैसे बदहाल होते गए, इसका खुलासा रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने किया है।

बैंकों का कर्ज क्यों डूबता चला गया और वे कैसे बदहाल होते गए, इसका खुलासा रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने किया है। राजन ने संसद की प्राक्कलन समिति को भेजे जवाब में बताया है कि कर्ज बांटते वक्त बैंकों ने जिस तरह की उदारता बरती, वही भारी पड़ गई। यह दौर 2006 से 2008 के बीच का था, जब आर्थिक वृद्धि अच्छे दौर में थी। बड़ी कंपनियों को ढांचागत परियोजनाओं में उज्ज्वल संभावनाएं दिखीं और उन्होंने उनमें निवेश के लिए बैंकों से भारी कर्ज ले लिया। लेकिन समस्याएं तब शुरू हुर्इं जब 2008 की आर्थिक मंदी की वजह से ज्यादातर परियोजनाएं शुरू ही नहीं हो पार्इं। राजन ने साफ कहा है कि बैंक कंपनियों को कर्ज देते वक्त इस बात का आकलन करने में एकदम नाकाम रहे कि अगर उनकी परियोजनाएं पूरी नहीं हुर्इं तो कर्ज की वापसी कैसे होगी। राजन ने एक और जो बड़ा कारण बताया, वह यह कि पिछले बारह साल में सरकारों की नीतिगत पंगुता एनपीए बढ़ने का बड़ा कारण बनी है। वक्त पर ठोस फैसले नहीं किए गए। गौरतलब है कि मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की प्राक्कलन समिति एनपीए की जांच और इससे निपटने के तरीकों पर विचार कर रही है।

एनपीए के मसले पर उठे सवालों को लेकर राजन ने जो जवाब दिए हैं, वे कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। एनपीए की समस्या ने बैंकिंग प्रणाली के खोखलेपन को उजागर करके रख दिया है। इससे पता चलता है कि बैंकों का अंदरूनी प्रबंध-तंत्र किस तरह से संचालित होता रहा। क्या यह गंभीर बात नहीं है कि बुनियादी परियोजनाओं के लिए हजारों करोड़ का कर्ज देते वक्त बैंक यह सुनिश्चित क्यों नहीं कर पाए कि इन मोटे कर्जों की वापसी कैसे होगी? एक तरह से यह खुले हाथ पैसा लुटाने जैसी बात हुई। इसलिए राजन ने एनपीए की समस्या का ठीकरा बैंकों के सिर ही फोड़ा है। कई मामलों में तो बैंकों ने कर्ज देने के लिए प्रवर्तक के निवेशक बैंक की रिपोर्ट के आधार पर ही करार कर लिया और अपनी ओर से जांच-पड़ताल जरा भी जरूरत नहीं समझी। दुनिया में शायद ही कोई कर्जदाता ऐसा होता होगा जो उसकी वापसी के तरीके सुनिश्चित नहीं करता हो। लेकिन भारत के व्यावसायिक बैंकों ने इसमें घोर लापरवाही बरती। ऐसे में क्या यह माना जाए कि बैंकिंग प्रणाली बिल्कुल ठप हालत में है!

हकीकत यह है कि कोई भी सरकार रही हो, या हो, अगर वह समय पर उचित नीतिगत फैसले नहीं ले पाती है तो उसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ते हैं। एनपीए की वजह से कंगाली की कगार पर आए बैंकों को फौरी खुराक के तौर पर पैकेज तो दिए दे गए हैं, लेकिन मूल बीमारी जस की तस बनी हुई है। एनपीए का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है और आज यह दस लाख करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है। इससे पता चलता है कि लंबे समय तक सरकारों और केंद्रीय बैंक ने व्यावसायिक बैंकों की लापरवाही पर किस कदर आंखें मूंदें रखीं। सरकारों की दिलचस्पी केवल बैंकों के निदेशक मंडल तक ही सीमित रहती है, यह किसी से छिपा नहीं है। अगर रिजर्व बैंक शुरू से व्यावसायिक बैंकों के परिचालन और कामकाज पर कड़ी निगरानी रखता तो नीरव मोदी जैसे बड़े घोटालेबाजों से बैंकों को बचाया जा सकता था। एनपीए पर हल्ला मचने के बाद सरकार और आरबीआइ भले ठोस कदम उठाने के दावे करें, लेकिन हालात उम्मीदों के बजाय आशंका को ही जन्म देने वाले हैं।

Outbrain
Show comments