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संपादकीय: असुरक्षित बच्चियां

बच्ची को उसकी बड़ी बहन के साथ घर में छोड़ कर पिता और मां काम पर गए थे। वहीं रहने वाला चालीस साल का एक व्यक्ति अकेली खेलती बच्ची को बहला कर ले गया और उससे बलात्कार किया।

Author December 18, 2018 2:59 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

दिल्ली के बिंदापुर इलाके में महज तीन साल की बच्ची से बलात्कार की घटना से साफ है कि अपराध पर काबू पाने की कवायदों और तमाम वादों के बरक्स हकीकत बेहद त्रासद और अफसोसनाक है। बच्ची को उसकी बड़ी बहन के साथ घर में छोड़ कर पिता और मां काम पर गए थे। वहीं रहने वाला चालीस साल का एक व्यक्ति अकेली खेलती बच्ची को बहला कर ले गया और उससे बलात्कार किया। बच्ची की चीखें सुन कर पड़ोस में रहने वाले लोग मौके पर पहुंचे। उन्होंने बुरी तरह से घायल बच्ची को देखा और आरोपी को पकड़ कर पहले पीटा, फिर पुलिस के हवाले किया। हो सकता है कि बच्ची से बलात्कार को एक आम आपराधिक घटना की तरह ही देखा जाए और आंकड़ों की गिनती में शामिल मान लिया जाए। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने के लिए मजबूर किया है कि कानून का शासन लागू करने के मामले में हमारी व्यवस्था अभी भी कितनी पीछे है और एक सभ्य समाज की कसौटी पर हमारा समाज कहां खड़ा है।

समय-समय पर होने वाले तमाम अध्ययनों में यही तथ्य बार-बार सामने आया है कि बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा करने वालों में ज्यादातर उनके परिचित ही होते हैं। दिल्ली में हुई इस घटना में भी बच्ची इस स्थिति में नहीं थी कि वह पड़ोस में रहने वाले उस व्यक्ति की बातों और व्यवहार पर शक कर पाती। इतनी कम उम्र में किसी व्यक्ति की मंशा को पहचान पाना वैसे भी संभव नहीं हो पाता। लेकिन अक्सर इससे ज्यादा उम्र के या किशोर बच्चे भी सिर्फ इस वजह से यौन-हिंसा या उत्पीड़न के शिकार हो जाते हैं कि वे पड़ोस में रहने वाले किसी परिचित की बातों पर भरोसा कर लेते हैं। दरअसल, हमारे यहां का सामाजिक ढांचा ऐसा है कि इसमें रिश्तेदारों से लेकर आस-पड़ोस के परिचितों पर विश्वास करना सिखाया जाता है। इस तरह भरोसा करना गलत नहीं है। लेकिन उसी अनुपात में बच्चों को किसी के अच्छे-बुरे बर्ताव आदि के बारे में भी गंभीरता से बताने और प्रशिक्षित करने पर जोर नहीं दिया जाता। नतीजतन, कई बार बच्चे अपने आसपास के बड़ों पर भरोसा करने के बदले आपराधिक बर्ताव का शिकार हो जाते हैं। लेकिन अबोध बच्चियों की स्थिति और ज्यादा जोखिम से भरी होती है।

छह साल पहले दिल्ली में चलती बस में बलात्कार और बर्बरता की घटना के बाद समूचे देश में इस मसले पर जिस तरह का आक्रोश पैदा हुआ था, तब लगा था कि न केवल कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बलात्कार जैसे अपराध पर काबू पाने के लिए ठोस उपाय किए जाएंगे, बल्कि समाज में सोचने-समझने से लेकर मानस के स्तर पर एक सकारात्मक बदलाव होगा और महिलाओं और बच्चियों का जीवन सहज और सुरक्षित होगा। लेकिन छह साल बाद भी अगर बच्चियां या महिलाएं खुद को सुरक्षित नहीं पा रही हैं और बलात्कार की घटनाओं में कोई खास फर्क नहीं दर्ज किया जा सका है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। बलात्कार से निपटने के कानूनी उपायों पर ठोस अमल आपराधिक मानस वाले लोगों के भीतर एक खौफ पैदा कर सकता है, लेकिन एक मुकम्मल व्यवस्था की जरूरत है, ताकि इस अपराध पर पूरी तरह काबू पाया जा सके। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कोई भी समाज या देश लोगों से ही बनता है और उनके व्यवहार में जो तत्त्व घुले होंगे, समाज और देश की पहचान में वह भी शामिल होगा। असुरक्षित बच्चियां और महिलाएं और उनके खिलाफ अपराध जब तक मौजूदा शक्ल में कायम रहेंगे, तब तक व्यवस्था के स्तर पर सभ्य, संवेदनशील और मजबूत होने का दावा नहीं किया जा सकता।

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