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संपादकीय: इंसाफ के रास्ते

सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सुनाई है। इस फैसले से दंगा पीड़ितों के भीतर एक बार फिर कानून के प्रति विश्वास जगा है। सज्जन कुमार को कड़ी सजा का यह फैसला कई संदेश लिए हुए है।

Author December 18, 2018 2:42 AM
1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की तस्वीर। (EXPRESS ARCHIVE PHOTO)

सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सुनाई है। इस फैसले से दंगा पीड़ितों के भीतर एक बार फिर कानून के प्रति विश्वास जगा है। सज्जन कुमार को कड़ी सजा का यह फैसला कई संदेश लिए हुए है। दंगा पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने में भले चौंतीस साल लग गए हों, लेकिन फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितना ही ताकतवर राजनीतिक क्यों न हो। दंगों में साफतौर पर नाम आने के बाद भी सज्जन कुमार कांग्रेस के प्रभावशाली सांसद के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे। निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। इसीलिए उनकी पार्टी को भी उनके बचाव का रास्ता मिला हुआ था। पर दिल्ली हाई कोर्ट ने इस कांग्रेसी नेता को हत्या की साजिश रचने का दोषी करार दिया है। इसलिए सिख विरोधी दंगों के मामले में सज्जन कुमार को मिली यह सजा पीड़ित परिवारों को न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा सकता है। सज्जन कुमारपर अपराध के लिए भीड़ को उकसाने, सिखों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले भाषण देने के आरोप थे। अदालत ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सज्जन कुमार से 31 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने को भी कहा है, ताकि लोगों को न्याय होता भी दिखे। हालांकि अभी सज्जन कुमार के पास सर्वोच्च अदालत में अपील का रास्ता खुला हुआ है। लेकिन अगर वहां वे अपील करते हैं और हार जाते हैं तो उन्हें ताउम्र जेल में रहना होगा।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख समुदाय के खिलाफ भड़के दंगों में अकेले दिल्ली में ही दो हजार से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया था। पूरी दिल्ली जगह-जगह गुस्साई भीड़ ने सिख परिवारों को निशाना बनाया था और उनके घरों को आग के हवाले कर दिया था। न्याय प्रक्रिया की जटिलताओं की वजह से मामले के लंबा खिंचने का आरोपियों ने फायदा उठाया और पीड़ित परिवारों की आधी जिंदगी न्याय के इंतजार में गुजर गई। गौरतलब है कि सज्जन कुमार सहित कांग्रेस के कई नेताओं के नाम दंगे की साजिश में सामने आए थे। पिछले महीने भी सिख विरोधी दंगों के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ने एक आरोपी को मौत की और एक को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इन दोनों पर पैंतीस-पैंतीस लाख का जुर्माना भी लगाया था। इसके बाद से ही सज्जन कुमार को लेकर आने वाले फैसले के बारे में भी कयास लगाए जा रहे थे।

चौरासी के दंगा पीड़ितों में आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो न्याय की उम्मीद में करीब साढ़े तीन दशक का वक्त गुजार चुके हैं। वैसे दंगा पीड़ितों की तादाद भी काफी है जो न्याय के लिए गुहार भी नहीं लगा सके, जिनका सब कुछ खत्म हो गया और जिन्होंने नए सिरे से जीवन की शुरुआत की। जिन्होंने दंगाइयों को भड़काने वालों के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटाई, तमाम धमकियों और दबावों के बीच जटिल कानूनी प्रक्रिया के तहत संघर्ष करने का संकल्प किया, उसी का नतीजा है कि सज्जन कुमार जैसे नेता को सजा के अंजाम तक लाया जा सका। जिस तरह से राजनीतिक दल दंगा पीड़ितों के दर्द को भुनाते रहे, वह भी कम शर्मनाक नहीं है। चाहे सिख विरोधी दंगे हों या गुजरात के दंगे, ये सभ्य समाज पर एक बड़ा कलंक हैं। इन दंगों ने दुनियाभर में भारत की छवि को भारी धक्का पहुंचाया। ऐसे में सज्जन कुमार ही नहीं, दंगे की साजिश रचने वाले हर आरोपी को न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए।

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