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संपादकीयः अपने बूते

हाल में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मात्र पच्चीस किलोमीटर दूर आमदी नाम के एक गांव में लोगों ने खुद तालाब बना डाला। यह गांव हर साल गर्मी में पानी के लिए तरस जाता था।

Author June 12, 2018 5:15 AM
श्रमदान और स्व-प्रेरणा की ऐसी मिसालों ने यह तो साबित किया है कि जहां चाह वहां राह।

जरूरत के साथ अगर मन में जज्बा हो और सामूहिक प्रयास हो तो बिना सरकारी के मदद के भी लोग रास्ते निकाल लेते हैं। सुविधाओं से वंचित ऐसे लोग उन लोगों के लिए मिसाल हैं जो सरकारी मदद की बाट जोहते रह जाते हैं। लोगों के ऐसे सफल प्रयास सरकारों के नाकारेपन, भ्रष्टाचार, लापरवाही और जनता के प्रति उपेक्षा की ओर भी इशारा करते हैं। लेकिन जागरूकता और जनभागीदारी के ऐसे छोटे-छोटे सामूहिक प्रयास बड़े-बड़े काम कर डालते हैं, जो सरकारों की जिम्मेदारी हैं। तालाब बनाने, सड़कें बना लेने, कुएं खोदने, पुल बना देने, स्कूल चलाने जैसे तमाम काम हैं जो लोगों ने अपनी ओर से पहल करते हुए पूरे किए हैं। लेकिन सरकारी कारिंदे और जनप्रतिनिधि जिस तरह जनता की उपेक्षा करते हैं वह चिंताजनक है।

हाल में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मात्र पच्चीस किलोमीटर दूर आमदी नाम के एक गांव में लोगों ने खुद तालाब बना डाला। यह गांव हर साल गर्मी में पानी के लिए तरस जाता था। लेकिन विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाली राज्य सरकार ने कोई सुध नहीं ली। यह हाल उस गांव का है जो राजधानी के एकदम करीब है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूरदराज के गांवों में जन-सुविधाओं का क्या हाल होगा। आमदी गांव के लोग लंबे समय से सरकार से तालाब बनाने की मांग कर रहे थे। लेकिन जब किसी ने नहीं सुनी तो लोगों ने खुद ही इस काम को अंजाम देने का संकल्प किया और जुट गए। मई, 2016 से चार एकड़ इलाके में तालाब बनाने का काम शुरू हुआ था। गांव के सारे लोगों ने श्रमदान किया। ऐसी ही और मिसालें हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के एक गांव में आदिवासियों ने चट्टानें काट कर साढ़े छह किलोमीटर लंबी सड़क बना डाली थी। आजादी के पैंसठ साल बाद इस गांव में प्राथमिक विद्यालय तो खुल गया था, लेकिन आने-जाने के लिए रास्ता नहीं था। छात्रों और शिक्षकों की समस्या को देखते हुए ही गांव वालों ने खुद ही सड़क बनाने का बीड़ा उठाया और दो साल से भी कम समय में रास्ता बन गया। महाराजगंज जिले में डेढ़ हजार से ज्यादा आबादी वाले एक गांव में ग्राम प्रधान ने बिना सरकारी मदद के हर घर में शौचालय बनवा दिए। इस काम में गांव के लोगों ने ही श्रमदान किया था।

श्रमदान और स्व-प्रेरणा की ऐसी मिसालों ने यह तो साबित किया है कि जहां चाह वहां राह। सरकारी सुविधाओं से वंचित ऐसे तमाम गांवों के कायापलट में जन-भागीदारी ही सबसे बड़ा और कारगर हथियार सबित हुई है। कई जगह लोगों ने एकजुट होकर अपना समय और पैसा लगाया और श्रमदान करते हुए छोटे पुल तक बना डाले, जिसके लिए वे बरसों से सरकारी मदद का इंतजार कर रहे थे। सीतापुर जिले में गोन नदी पर पुल नहीं था। गांव वालों ने खुद ही अस्थायी पुल बना डाला। ऐसे में सरकार और प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में आती है। जाहिर है, जनप्रतिनिधि और अधिकारी एक सीमित दायरे के बाद हालात का जायजा लेने की जहमत नहीं उठाना चाहते और छोटे-छोटे काम भी बरसों तक ऐसी अनदेखी का शिकार हो जाते हैं। हार कर लोगों को आगे पाना पड़ता है। यह अच्छी बात है। लेकिन सरकारें क्या कर रही हैं!

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