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संपादकीयः दिल्ली की रस्साकशी

कुछ दिनों से दिल्ली में सियासी हालात ने एक अजीब मोड़ ले लिया है। हफ्ते भर से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने तीन मंत्रियों के साथ उपराज्यपाल के कार्यालय में धरने और अनशन पर बैठे हैं।

Author June 18, 2018 4:34 AM
एलजी आवास पर धरना देते मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल व अन्‍य। (Photo: Twitter/Arvind Kejriwal)

कुछ दिनों से दिल्ली में सियासी हालात ने एक अजीब मोड़ ले लिया है। हफ्ते भर से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने तीन मंत्रियों के साथ उपराज्यपाल के कार्यालय में धरने और अनशन पर बैठे हैं। दूसरी ओर, भाजपा के विधायकों ने भी अपने समर्थकों के साथ मुख्यमंत्री कार्यालय में धरना दे रखा है। धरने के जवाब में धरना! इस रस्साकशी के बरक्स दिल्ली का बुरा हाल है। भीषण गरमी में बहुत सारे इलाके पानी के संकट से जूझ रहे हैं। वायु प्रदूषण और खूब धूल भरी हवा ने भी लोगों को हलकान कर रखा है। ऐसे में, जब दिल्ली के लोग इन मुश्किलों से राहत की कोई ठोस पहल होने का इंतजार कर रहे हैं, तो दिल्ली की सरकार धरने पर है और केंद्र को जैसे इस बात की कोई फिक्र नहीं है कि दिल्ली का कामकाज कैसे सुचारु रूप से चले। अपने तीन मंत्रियों समेत केजरीवाल के धरने से जहां एक सरकार की गरिमा और गंभीरता को गहरी चोट पहुंची है, वहीं केंद्र की बेरुखी ने उसकी असंवेदनशीलता उजागर की है। केजरीवाल और उनके मंत्री इसलिए धरने और अनशन पर बैठे हैं, क्योंकि आइएएस अधिकारी उन्हें सहयोग नहीं कर रहे हैं। ये अधिकारी हड़ताल पर हैं। हालांकि आइएएस अधिकारियों के संघ ने हड़ताल से इनकार किया है, पर यह बात सही है कि वे मुख्यमंत्री और मंत्रियों की बुलाई बैठकों में हिस्सा नहीं ले रहे हैं।

इससे केजरीवाल का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। उनकी मांग है कि केंद्र आइएएस अफसरों की यह कथित या अनौपचारिक हड़ताल खत्म कराए। इस मांग में कुछ भी गलत नहीं है। आइएएस अफसर केंद्र के मातहत आते हैं, इसलिए वाजिब दखल देना उसका फर्ज बनता है। अलबत्ता इस पर दो राय हो सकती है कि क्या मुख्यमंत्री को धरने पर बैठना चाहिए था? या, उन्हें अपनी मांग मुखर करने के लिए कोई और तरीका चुनना चाहिए था? सवाल यह भी है कि जिस सचिवालय में पत्रकारों को भी बहुत मुश्किल से प्रवेश मिलता है, वहां बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री कार्यालय तक कैसे पहुंच गए? दिल्ली पुलिस कानून-व्यवस्था के तकाजों के हिसाब से काम करती है, या अपने राजनीतिक आकाओं की खुशी-नाखुशी को ध्यान में रख कर? धरना दे रहे आप मंत्रियों ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग भी उठा दी है। हो सकता है यह अगले चुनाव की उनकी तैयारी का हिस्सा भी हो। लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले, यह मांग क्यों नहीं उठनी चाहिए?

सबसे पहले भाजपा ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग शुरू की थी और दिल्ली विधानसभा के कई चुनावों में यह उसका सबसे खास मुद््दा रहा था। अब जब केंद्र में भाजपा अपने बूते सत्तासीन है, तो दिल्लीवासियों से किए अपने पुराने वायदे को पूरा करने के लिए वह क्या कर रही है? अगर दिल्ली सरकार के पास पर्याप्त अधिकार और संसाधन नहीं होंगे, तो उसकी जवाबदेही कैसे तय होगी? ‘आप’ के कई विधायकों पर गंभीर आरोप लग चुके हैं। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी और उसकी सरकार ने बहुत मामलों में निराश किया है। लेकिन एक चुनी हुई सरकार को रोज प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों तरह की अड़चनें झेलनी पड़ें, तो यह कतई जनादेश का सम्मान नहीं है। यह घोर अलोकतांत्रिक है, और सहकारी संघवाद के खिलाफ है। केंद्र को गतिरोध दूर करने की पहल जल्द से जल्द करनी चाहिए।

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