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संपादकीयः फिर संघर्ष

रमजान के महीने में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ घोषित एकतरफा संघर्षविराम केंद्र सरकार ने हटा लिया है। अब सेना और सुरक्षाबल घाटी में पहले की तरह आतंकवादियों के सफाए के लिए अभियान चला सकेंगे।

Author Published on: June 18, 2018 4:31 AM
बीते एक महीने में आतंकवादी घटनाएं बढ़ीं, सुरक्षाबलों के कई सिपाही हताहत हुए। पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। पाकिस्तान की तरफ से भी हमले हुए।

रमजान के महीने में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ घोषित एकतरफा संघर्षविराम केंद्र सरकार ने हटा लिया है। अब सेना और सुरक्षाबल घाटी में पहले की तरह आतंकवादियों के सफाए के लिए अभियान चला सकेंगे। इस्लाम में रमजान के दौरान खूनखराबा वर्जित है, इसलिए सरकार ने अच्छी मंशा से संघर्षविराम लागू किया था। तब माना गया था कि इससे शायद घाटी के लोगों का मन कुछ बदलेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। बीते एक महीने में आतंकवादी घटनाएं बढ़ीं, सुरक्षाबलों के कई सिपाही हताहत हुए। पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई। पाकिस्तान की तरफ से भी हमले हुए। यहां तक ईद के दिन घाटी के लोगों ने पत्थरबाजी की। हालांकि आतंकी संगठनों ने शुरू में ही केंद्र की तरफ से घोषित संघर्षविराम को मानने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उनके लिए हथियार ही अंतिम रास्ता है। पर सरकार ने अपना फैसला नहीं बदला। अब फिर से उसने सख्ती का रास्ता अपनाने की घोषणा कर दी है। देखने की बात है कि इससे आतंकवादियों के मंसूबों को तोड़ने में कितनी कामयाबी मिलेगी।

अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है और खुफिया सूचना है कि आतंकी संगठन इस दौरान हमले की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में सरकार और सुरक्षाबलों के सामने बड़ी चुनौती है कि वे यात्रा को निर्विघ्न संपन्न करा सकें। आपरेशन आल आउट के तहत पिछले कुछ महीनों से सुरक्षाबल घर-घर तलाशी और आतंकियों की पहचान कर उनकी धर-पकड़ में जुटे हैं। इस दौरान कई आतंकवादी और सुरक्षाबलों के सिपाही मारे जा चुके हैं। सरकार का दावा है कि इस अभियान के चलते घाटी में आतंकवादी घटनाएं कम हुई हैं। मगर इससे न तो आतंकवादियों की हिम्मत पस्त नजर आई है और न स्थानीय लोगों का मिजाज बदला है। ईद के दिन पत्थरबाजी से साफ हो गया कि मौका पाते ही लोग विरोध का हिंसक तरीका अख्तियार कर लेते हैं। इससे यह भी साफ है कि उन पर आतंकी और अलगाववादी संगठनों का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। इसलिए हथियार के जरिए उनका मन बदलने में कितनी मदद मिलेगी, कहना मुश्किल है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आतंकवादियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाना जरूरी है। सरकार ने अलगाववादी संगठनों के बैंक खातों और सीमापार से मिलने वाली आर्थिक मदद पर कड़ी नजर रख कर काफी हद तक उन पर नकेल कसी है। पर, स्थानीय लोगों और युवाओं को गुमराह होने और हथियार उठाने से रोकने में कामयाबी नहीं मिल पाई है। इसकी कई वजहें हैं। रोजगार के नए अवसर न पैदा कर पाना मुख्य वजह है। इसके अलावा अतीत की सेना और सुरक्षाबलों की ज्यादतियां हैं, जिनकी याद दिला कर चरमपंथी और अलगाववादी नेता कश्मीरी युवाओं को पत्थर या फिर हथियार उठाने को उकसाने पाते हैं। इस तरह मौका मिलते ही वे हाथों में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। हथियार के बल पर उन्हें रोकने की कोशिश अक्सर उलटा असर करती है। सीमा पार से मिल रही चरमपंथी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए हथियार जरूरी हैं, पर अपने ही गुमराह हो गए नागरिकों को इस तरह सही रास्ते पर लाना, उन्हें रचनात्मक गतिविधियों की तरफ मोड़ना शायद ही संभव हो। इसके लिए स्थानीय लोगों का भरोसा जीतना, उनका मन बदलना जरूरी है। इसलिए हथियार के साथ-साथ उन उपायों पर भी विचार करने की जरूरत है, जिनके जरिए स्थानीय लोगों का मन बदला जा सके।

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