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संपादकीयः विद्वेष की हिंसा

अपने बीच के कमजोर या किन्हीं वजहों से पिछड़ गए तबकों को उनका हक दिलाने की पहलकदमी किसी भी समाज के सभ्य होने की पहचान है

Author June 14, 2018 05:13 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

अपने बीच के कमजोर या किन्हीं वजहों से पिछड़ गए तबकों को उनका हक दिलाने की पहलकदमी किसी भी समाज के सभ्य होने की पहचान है। लेकिन हमारे देश में कई ऐसी विडंबनाएं बराबरी पर आधारित समाज बनने की राह में बाधा खड़ी करती हैं। खासतौर पर दलित-वंचित जातियों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी यही दर्शाती है कि आजादी के सात दशक गुजर जाने के बाद भी एक बड़े तबके को सम्मान और बराबरी के साथ जीवन जीने का हक पूरी तरह नहीं मिल पाया है। यों देश के अलग-अलग इलाकों में दलित समुदाय पर अत्याचार की घटनाएं आम हैं और इस मसले पर सरकारों के रवैये पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। लेकिन इस मामले में राजस्थान में एक खास प्रवृत्ति ज्यादा चिंता पैदा करती है। खुद राज्य अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचार के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। जहां पहले इस समुदाय पर हमलों में गंभीर क्षति या चोट पहुंचाने जैसी घटनाएं आम होती थीं, वहीं अब हत्या और बलात्कार के मामले तेजी से बढ़े हैं।

इन तमाम आपराधिक घटनाओं में सबसे ज्यादा महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। यही वजह है कि कई मानवाधिकार संगठनों और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक महिला मुख्यमंत्री का शासन होते हुए भी ऐसे अपराधों में बढ़ोतरी पर सवाल उठाए हैं। आखिर दलितों पर हमला करने वालों के भीतर कानून का खौफ काम क्यों नहीं कर रहा? हैरानी की बात है कि आधुनिक होते समय के साथ जहां समाज के सभ्य होने की उम्मीद की जाती है, वहीं राजस्थान में दलितों के प्रति छुआछूत बरतने वाले व्यवहार पहले की तरह सामने आ रहे हैं। इसके अलावा, दुराग्रह से भरी घटनाएं भी बदस्तूर जारी हैं, जिनमें अगर कोई दलित पृष्ठभूमि से आना वाला दूल्हा विवाह के मौके पर घोड़ी पर सवार होता है तो उसे रोकने के लिए ऊंची जातियों के लोग हिंसा तक का सहारा लेते हैं। विडंबना यह है कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के संरक्षण के लिए बने कानून के बावजूद दबंग तबकों के बीच उसका खौफ नहीं के बराबर नजर आता है। राजस्थान में जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय के मुताबिक पुलिस का रवैया ऐसा होता है कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत दलितों के लिए अपना मुकदमा दर्ज करवाना आसान नहीं है।

कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले के तहत दलितों के खिलाफ अपराधों के मामलों में इस कानून की धाराएं लगाने की स्थितियां ज्यादा जटिल बना दी हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि इस तरह के सामाजिक भेदभाव और अत्याचारों के अलावा प्रशासन और पुलिस का रवैया भी आमतौर पर इन तबकों के प्रति सहयोग का नहीं रहता। इसका सीधा असर इस तरह के अपराधों के पीड़ितों से जुड़े मुकदमों पर पड़ता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था कैसे काम करेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में मुकदमों के निपटारे की गति काफी धीमी और सजा की दर पहले ही बहुत कम है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि समाज के कमजोर तबकों के सम्मान और गरिमा से जीने के अधिकारों की सुरक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है। अगर सरकार या प्रशासन की ओर से लापरवाही बरती जाती है या ऐसी शिकायतों के प्रति टालमटोल का रवैया अख्तियार किया जाता है तो इसे व्यवस्था के स्तर पर बरते जाने वाले भेदभाव और लोकतंत्र पर चोट की तरह देखा जाएगा।

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