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संपादकीयः मदद और मुश्किलें

गन्ना किसानों की सबसे बड़ी समस्या ही बकाया पैसे की वसूली है। किसान चीनी मिलों को जो गन्ना बेचते हैं, उसके तत्काल भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है।

Author June 7, 2018 4:48 AM
चीनी उद्योग को संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार ने साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए की सहायता राशि घोषित की है।

चीनी उद्योग को संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार ने साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए की सहायता राशि घोषित की है। उम्मीद की जाती है कि इससे चीनी मिलों की हालत सुधरेगी। पर इसमें गन्ना किसानों के उद्धार लिए कोई बहुत ज्यादा रकम नजर नहीं आती। इसी पैसे से चीनी मिलों को एथनॉल उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए सस्ता कर्ज मुहैया कराया जाना है। इसके लिए साढ़े चार हजार करोड़ रुपए रखे गए हैं। चीनी का तीस लाख टन बफर स्टॉक भी बनाया जाना है। इस पर बारह सौ करोड़ रुपए खर्च होंगे। लेकिन गन्ना किसानों के बकाए के भुगतान के सिर्फ एक हजार पांच सौ चालीस करोड़ रुपए रखे गए हैं। गन्ना किसानों के लिए यह फौरी राहत से ज्यादा कुछ नहीं है। हालांकि सहायता राशि से मिल मालिकों को बड़ी राहत मिलेगी।

चीनी मिलों पर किसानों का बकाया कोई आज की समस्या नहीं है। मिल मालिकों का हमेशा से यह रवैया रहा है कि गन्ना किसानों को कभी समय से भुगतान नहीं किया जाता। सालों-साल किसान बकाए के इंतजार में गुजार देते हैं। आंदोलन करने को मजबूर होते हैं। कई बार आत्महत्या जैसे कदम भी उठा लेते हैं। चिंताजनक बात यह है कि जब भी चीनी उद्योग के लिए कोई सहायता राशि जारी होती है, तो उसमें गन्ना किसानों के हित गौण हो जाते हैं और चीनी मिलों को फायदा पहुंचता है। बताया जा रहा है कि इस वक्त चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बाईस हजार करोड़ रुपए बकाया है। यह रकम इस सहायता राशि के तीन गुना से थोड़ी ही कम बैठती है। इसमें उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर बकाया बारह हजार करोड़ रुपए शामिल हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी बड़ी रकम चीनी मिलें किसानों को कैसे और कब तक चुकाएंगी? यह बकाया कोई एकाध या कुछ साल में नहीं चढ़ा है, बल्कि लंबे समय से चढ़ता चला आ रहा है। विचित्र बात तो यह है किसी भी सरकार ने शायद ही कभीऐसा कोई कदम उठाया हो, जो चीनी मिलों को बकाए के बोझ से मुक्ति दिला सके।

गन्ना किसानों की सबसे बड़ी समस्या ही बकाया पैसे की वसूली है। किसान चीनी मिलों को जो गन्ना बेचते हैं, उसके तत्काल भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है। व्यावहारिक रूप से होना यह चाहिए कि किसानों को एक निश्चित अवधि में उनका दाम मिल जाए और बकाए की नौबत ही न रहे। इससे किसान को भी अगली फसल के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ेगा और चीनी मिलें भी बकाए के बोझ से मुक्त रहेंगी। हालांकि केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश सरकार को पहले ही सलाह दे चुकी है कि वह चीनी क्षेत्र के लिए रंगराजन समिति के सुझाए सुधारों को लागू करे, जैसे महाराष्ट्र और कर्नाटक लागू कर चुके हैं। इसके तहत चीनी मिलें किसानों को केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) पहले ही चुका देती हैं और बाकी पैसा चीनी बिक्री से हुई आमद से चुकाने की व्यवस्था है। इससे चीनी मिलें भी बकाए के बोझ से निजात पा सकेंगी। लेकिन समस्या यह है कि व्यावहारिक और तार्किक समाधान कोई नहीं अपना रहा। मिलों पर किसानों का बकाया बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सहायता राशि के अलावा केंद्र और राज्य सरकारों को मिल कर ऐसे कदम उठाने की जरूरत है, जो गन्ना किसानों की समस्या का स्थायी हल निकाल सकें, तभी किसानों की दशा सुधरेगी।

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