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संपादकीयः मुसीबत की थैली

करीब ढाई महीने पहले महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में प्लास्टिक और थर्मोकोल के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी और उसका उल्लंघन करने वालों के लिए सख्त सजा तय की थी।

Author June 7, 2018 4:51 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अब यह छिपी बात नहीं है कि रोजमर्रा के कामों में प्लास्टिक से बनी चीजों के इस्तेमाल का पर्यावरण पर कितना घातक असर पड़ता है और इससे उपजी स्थिति लगातार बिगड़ रही है। इसके मद्देनजर समय-समय पर सरकारें प्लास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करने से लेकर इस पर पाबंदी लगाने तक की घोषणाएं करती रही हैं। इस साल ‘प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करो’ विषय के साथ भारत विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान देश है। इसलिए इस मौके पर तमिलनाडु, नगालैंड, महाराष्ट्र और झारखंड की ओर से प्लास्टिक मुक्त होने की घोषणा की खास अहमियत है। इसके अलावा, उत्तराखंड ने भी इकतीस जुलाई से पॉलीथिन को प्रतिबंधित करने की बात कही है। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है कि राज्यों ने प्लास्टिक से निजात पाने के लिए पहल करने का दावा किया है। मगर मुश्किल यह है कि लंबे समय से प्लास्टिक से होने वाले नुकसानों को लेकर जताई जाने वाली चिंताओं के बावजूद इससे निजात पाने की कवायदें महज घोषणाओं तक सिमटी हुई हैं।

करीब ढाई महीने पहले महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में प्लास्टिक और थर्मोकोल के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी और उसका उल्लंघन करने वालों के लिए सख्त सजा तय की थी। अब वहां के पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि राज्य अगले एक साल में प्लास्टिक से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। इसी तरह बाकी राज्यों ने भी इस समस्या पर काबू पाने में वक्त लगने की बात कही है। निश्चित रूप से रोजमर्रा की जरूरत में शामिल हो चुके प्लास्टिक के उपयोग को अचानक प्रतिबंधित करके इस समस्या से नहीं निपटा जा सकता। पर यह भी सच है कि आधी-अधूरी कवायदों से प्लास्टिक से पार पाने की कोशिशें कामयाब नहीं हो सकतीं। मसलन, महाराष्ट्र सरकार ने कई रूपों में प्लास्टिक से बनी चीजों पर पाबंदी लगाने की घोषणा की थी, लेकिन प्रसंस्करित उत्पादों की पैकिंग, बागवानी उत्पादों आदि मामलों में इसके इस्तेमाल की छूट दे दी। इसके अलावा, विशेष आर्थिक क्षेत्रों को भी इस प्रतिबंध से अलग रखा गया। क्या इस तरह की बंटी हुई नीतियों से प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकेगा? इससे पहले भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड जैसे राज्यों ने प्लास्टिक पर पाबंदी लगाई, लेकिन आज भी वहां खुलेआम प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल हो रहा है।

दरअसल, प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग और उसके कचरे से बढ़ती समस्या ने बड़ी समस्या की शक्ल अख्तियार कर ली है। आज प्लास्टिक से बने सामान हमारे रोजाना के कामकाज में इस कदर शामिल हो चुके हैं कि इसका विकल्प कम दिखता है। लेकिन हमारी सुविधाओं का बड़ा खमियाजा पर्यावरण को उठाना पड़ता है और इससे हमारी सेहत के लिए कई तरह के जोखिम पैदा होते हैं। खेतों की उर्वरा शक्ति कम होने, भूमि बंजर होने, शहरों-महानगरों में नालियां या पानी का निकास अवरुद्ध होने जैसी समस्याएं बड़ी चुनौती हो चुकी हैं। चूंकि ज्यादातर देशों में इसके निस्तारण सही तरीके से नहीं किया जाता है, उसके चलते इससे होने वाला प्रदूषण समुद्र से लेकर वायु तक को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। दुनिया भर के महासागरों में हर साल अस्सी लाख टन प्लास्टिक का कचरा फेंका जाता है। वैश्विक पैमाने पर प्लास्टिक के व्यापक इस्तेमाल के नुकसानों के मद्देनजर जताई जाने वाली चिंताएं कोई नई नहीं हैं। सवाल है कि केवल फिक्र जताने या इसके उपयोग पर पाबंदी लगाने की बातें कब तक जमीन पर उतरेंगी!

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