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संपादकीयः लक्ष्य और हकीकत

नीति आयोग की संचालन परिषद की चौथी बैठक, जिसमें तेईस राज्यों के मुख्यमंत्री और एक केंद्रशासित राज्य के मुख्यमंत्री शामिल हुए, बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई। सबसे विवादास्पद मसला पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों का था।

Author June 19, 2018 4:10 AM
रविवार (17 जून 2018) की बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी का अभिवादन करते बिहार के सीएम नीतीश कुमार (PTI Photo)

नीति आयोग की संचालन परिषद की चौथी बैठक, जिसमें तेईस राज्यों के मुख्यमंत्री और एक केंद्रशासित राज्य के मुख्यमंत्री शामिल हुए, बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई। सबसे विवादास्पद मसला पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों का था। आयोग ने वित्त बंटवारे के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की सिफारिश कर रखी है। कई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं और उनकी मांग है कि 1971 की जनगणना को आधार बनाया जाए। लेकिन केंद्र से उन्हें निराशा ही हाथ लगी। प्रधानमंत्री ने इस विवाद को सुलझाने के बजाय अपनी पसंद के मुद्दों पर बोलना बेहतर समझा। दूसरी तरफ ममता बनर्जी समेत चार विपक्ष-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केजरीवाल के धरने की हिमायत करते हुए आइएएस अधिकारियों के सहयोग न करने की उनकी शिकायत प्रधानमंत्री तक पहुंचाते हुए विवाद को जल्द खत्म कराने का अनुरोध किया। मगर इस पर मोदी मौन रहे। उनका संबोधन दो बातों पर केंद्रित रहा। एक तो यह कि उन्होंने सारे चुनाव एक साथ कराने का आह्वान किया। पर इसकी व्यावहारिक और वैधानिक कठिनाइयों को देखते हुए इस पर उनके आग्रह में नरमी के भी संकेत दिखे।

एक साथ चुनाव की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य इस पर सोचें और अगर एक साथ चुनाव नहीं तो कम से कम पंचायत से लोकसभा तक एक मतदाता सूची ही बना लें। आर्थिक वृद्धि दर की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे दो अंक में ले जाने का आह्वान किया। पर उन्होंने भी माना कि यह बहुत कठिन चुनौती है। पिछले वित्तवर्ष की चौथी तिमाही में 7.7 फीसद की शानदार वृद्धि दर हासिल होने से सरकार का उत्साहित होना स्वाभाविक है। लेकिन इसे दस फीसद तक ले जाना क्यों मुश्किल है इसका अहसास सरकार को भी होगा। जनवरी से मार्च के बीच वृद्धि दर भले 7.7 फीसद हासिल हुई हो, पर 2017-18 के पूरे वित्तवर्ष को हिसाब में लें, तो वृद्धि दर 6.7 फीसद ही थी। फिर, मौजूदा वित्तवर्ष यानी 2018-19 की मुश्किलें भी जाहिर हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बेतहाशा चढ़ गए हैं और इसके फलस्वरूप देश में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई हैं और इस सिलसिले पर विराम लगने के फिलहाल कोई आसार नहीं दिख रहे। हालिया आंकड़ों ने महंगाई में बढ़ोतरी के रुझान की ही पुष्टि की है और शायद इसी को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक ने ताजा मौद्रिक समीक्षा में रेपो दरों में चौथाई फीसद की बढ़ोतरी कर दी। कुछ महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपए का रिकार्ड अवमूल्यन हुआ है।

देश का व्यापार घाटा पिछले चार माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। किसानों समेत तमाम असंगठित क्षेत्र के लोगों में अपनी हालत को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। निजी निवेश सुस्त है, निर्यात की तस्वीर निराशाजनक है और रोजगार-सृजन की गति बेहद मंद है, जिसकी वजह से यह सवाल एक बार फिर से उठने लगा है कि क्या हम रोजगार-विहीन विकास के दौर में हैं? पिछले डेढ़ दशक में, अधिकांश समय देश की आर्थिक वृद्धि दर ऊंची ही रही है, कुछ साल तो आठ से नौ फीसद की शानदार वृद्धि। पर जब संयुक्त राष्ट्र की तरफ से मानव विकास सूचकांक और विश्व भुखमरी सूचकांक या फिर विभिन्न देशों की बाबत जन स्वास्थ्य सूचकांक जैसी अध्ययन-रिपोर्टें आती हैं, तो पता चलता है कि हम अग्रणी देशों की कतार में नहीं, फिसड््डी देशों के बीच खड़े हैं। ऊंची आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद यह हालत क्यों है? जाहिर है, हमें केवल वृद्धि दर के बारे में नहीं, बल्कि विकास की समावेशिता के बारे में भी सोचना होगा।

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