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संपादकीयः सहयोग और विरोध

इस साल अप्रैल में हुई एससीओ के विदेशमंत्रियों की बैठक में भी भारत ने ओबीओआर का विरोध किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य से भारत के इस रुख की एक बार फिर पुष्टि हुई है।

Author June 12, 2018 5:12 AM
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बाएं) और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (AP Photo/Manish Swarup, File)

एससीओ यानी शंघाई सहयोग संगठन का दो दिवसीय सम्मेलन चीन के किंगदाओ शहर में संपन्न हो गया। इस मौके पर जहां भारत और चीन के बीच दो महत्त्वपूर्ण समझौते हुए, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ अलग से द्विपक्षीय वार्ताएं कीं। गौरतलब है कि एससीओ में चीन, भारत और रूस के अलावा पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान भी शामिल हैं। इन आठ देशों में दुनिया की बयालीस फीसद आबादी रहती है और दुनिया के कुल जीडीपी में इन देशों का सम्मिलित हिस्सा बीस फीसद है। इसलिए ठीक ही एससीओ को दुनिया का एक बड़ा और बहुत महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन माना जाता है। एससीओ के किंगदाओ शिखर सम्मेलन की एक खास बात यह रही कि भारत ने चीन की बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना का समर्थन करने से इनकार कर दिया। यों यह पहला मौका नहीं था जब भारत ने ओबीओआर यानी वन बेल्ट वन रोड को लेकर अपना एतराज जताया हो। दरअसल, शुरू से ही भारत का यही रुख रहा है, क्योंकि इस परियोजना के तहत आने वाला सीपीईसी यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। और पाकिस्तान के कब्जे वाले इस इलाके पर भारत अपना दावा जताता आया है। इसलिए भारत मानता है कि ओबीओआर में उसकी संप्रभुता का खयाल नहीं रखा गया। यही कारण है कि पिछले साल मई में जब चीन ने ओबीओआर के मद्देनजर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया, तो उसमें शामिल होने के चीन के न्योते को भारत ने स्वीकार नहीं किया, जबकि उसमें उनतीस राष्ट्राध्यक्षों ने शिरकत की थी।

इस साल अप्रैल में हुई एससीओ के विदेशमंत्रियों की बैठक में भी भारत ने ओबीओआर का विरोध किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य से भारत के इस रुख की एक बार फिर पुष्टि हुई है। शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि एससीओ क्षेत्र और पड़ोसी देशों से संपर्क भारत की प्राथमिकता है। हम ऐसी नई संपर्क परियोजनाओं का स्वागत करते हैं जो समावेशी, पारदर्शी और सभी देशों की संप्रभुता व क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। जहां एससीओ के बाकी सब सदस्य-देशों ने चीन की वन वेल्ट वन रोड परियोजना को लेकर अपने समर्थन को दोहराया, वहीं भारत की ओर से मोदी ने कुछ भी कहने से मना कर दिया। हालांकि एससीओ का किंगदाओ घोषणापत्र सर्वसम्मति से जारी हुआ, पर इसमें जहां ओबीओआर का जिक्र है वहां भारत का नाम नदारद है, जबकि एससीओ के बाकी सब सदस्य-देशों के नाम के साथ ओबीओआर के प्रति उनके समर्थन को बताया गया है।

जाहिर है, भारत अकेला देश है जो इस परियोजना का विरोध कर रहा है। इस मामले में भारत न केवल एससीओ के भीतर बल्कि दक्षिण एशिया में भी अकेला है, क्योंकि पिछले साल मई में भारत ने जिस ओबीओआर सम्मेलन का बहिष्कार किया था, उसमें नेपाल और श्रीलंका जैसे मित्र और पड़ोसी देशों तक ने शिरकत की थी। इस अकेलेपन को एक बड़े मामले में भारत का अलग-थलग पड़ जाना भी कह सकते हैं। लेकिन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की वजह से ओबीओआर पर विरोध जताना भारत के लिए जरूरी था, वरना यही समझा जाता कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर अपने रुख से वह पीछे हट गया है। यों डेढ़ महीने पहले मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता समेत कई बातों से चीन से संबंध सुधरने के कुछ संकेत नजर आ रहे हैं। पर सवाल है, क्या ओबीओआर को लेकर भारत के विरोध के बावजूद चीन से संबंध सुधार की प्रक्रिया जारी रह पाएगी!

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