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संपादकीयः संदेश और सवाल

राष्ट्रपति भवन में संपन्न दो दिवसीय राज्यपाल सम्मेलन एक रस्मी आयोजन बन कर रह गया, तो इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है। राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारियां क्या हैं और उन्हें निभाने में वे कितने खरे साबित हो रहे हैं, सबसे मौजूं सवाल तो यही था।

Author June 6, 2018 03:58 am
राष्ट्रपति ने उच्चशिक्षा के परिदृश्य के बारे में बात करते हुए कहा कि हमारे देश के उनहत्तर फीसद विश्वविद्यालय राज्य सरकारों के नियंत्रण में चल रहे हैं जिनमें चौरानवे फीसद विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं

राष्ट्रपति भवन में संपन्न दो दिवसीय राज्यपाल सम्मेलन एक रस्मी आयोजन बन कर रह गया, तो इसमें कुछ भी हैरानी की बात नहीं है। राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारियां क्या हैं और उन्हें निभाने में वे कितने खरे साबित हो रहे हैं, सबसे मौजूं सवाल तो यही था। पर यह सवाल किसी ने नहीं उठाया, क्योंकि यह एक असुविधाजनक सवाल था। सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति महोदय ने कुलाधिपति के तौर पर राज्यपालों की भूमिका रेखांकित की, और उच्चशिक्षा से जुड़ी कुछ उम्मीदें गिनार्इं। वहीं प्रधानमंत्री ने राज्यपालों को संबोधित करते हुए कहा कि वे जीवन के विविध क्षेत्रों के अपने अनुभवों से लोगों को केंद्रीय योजनाओं का अधिकतम फायदा उठाने में मदद करें। अलबत्ता प्रधानमंत्री ने संघीय ढांचे में उनकी निर्णायक भूमिका की भी याद दिलाई। पर एक भी ज्वलंत सवाल नहीं उठा, चाहे वह राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर हो, या राजभवन का राजनीतिक इस्तेमाल रोकने को लेकर। दरअसल, केंद्र में जो भी पार्टी सत्तासीन होती है उसकी दिलचस्पी ऐसे सवालों में नहीं होती, बल्कि इनसे कन्नी काटने में ही उसे सहूलियत मालूम पड़ती है। लेकिन ये सवाल राज्यपाल पद की गरिमा और साख से वास्ता रखते हैं, इसलिए इन्हें टालना हमारी लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था की मजबूती के लिए ठीक नहीं है।

राष्ट्रपति ने उच्चशिक्षा के परिदृश्य के बारे में बात करते हुए कहा कि हमारे देश के उनहत्तर फीसद विश्वविद्यालय राज्य सरकारों के नियंत्रण में चल रहे हैं जिनमें चौरानवे फीसद विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं; इस तरह अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल हैं और वे चाहें तो अपने पद, अधिकार और अनुभव का उपयोग करते हुए शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान कर सकते हैं। देश में उच्चशिक्षा की हालत किसी से छिपी नहीं है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में भारत कहीं भी नहीं है। क्या राज्यपाल देश में उच्चशिक्षा की तस्वीर बदल सकते हैं? दाखिले और परीक्षाएं समय पर हों, नतीजे समय पर निकलें और दीक्षांत समारोह समय पर हों, इस तरह के सुधार वे करा सकते हैं। लेकिन उपर्युक्त शिक्षा नीति का निर्माण सरकार की जिम्मेदारी होती है। विश्वविद्यालयों में बहुत सारे पद खाली हैं। इन पर नियुक्तियां भी संबंधित सरकारों की मर्जी के बिना संभव नहीं हैं। फिर, राज्यपाल से केंद्रीय योजनाओं के कारगर क्रियान्वयन में हाथ बंटाने की उम्मीद करना उनकी संवैधानिक मर्यादा को नजरअंदाज करना है। राज्यपालों से वे उम्मीदें नहीं की जानी चाहिए जो राज्य सरकारों से की जाती हैं।

राज्यपालों से इतनी उम्मीद करना काफी होगा कि वे अपने पद की गरिमा हर हाल में बनाए रखें, संविधान में उनसे जो अपेक्षाएं की गई हैं वे पूरी करें, राजनीतिक रूप से सदा निष्पक्षता का आचरण करें और सिर्फ संविधान से निर्देशित हों। ऐसा नहीं है कि राज्यपालों को अपने पद से जुड़े ये तकाजे मालूम न हों। लेकिन दशकों से यह होता आया है कि जो भी पार्टी केंद्र में सत्तासीन होती है, राज्यपालों के चयन में उसी की मर्जी चलती है। नतीजतन राजभवन अपने चहेतों को उपकृत करने, थके-मांदे या चुके हुए नेताओं को सम्मानजनक विश्राम देने या पार्टी के किसी नेता को सक्रिय राजनीति से हटाने का जरिया बनते गए हैं। ऐसे लोग ‘जरूरत’ पड़ने पर अहसान चुकाते भी हैं। यही कारण है कि राज्यपालों के कई फैसले विवाद का विषय बने हैं। सरकारिया आयोग ने ऐसे लोगों को राज्यपाल न बनाने की सलाह दी थी, जो सक्रिय राजनीति में रह चुके हों। इस सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जबकि इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।

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