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संपादकीयः दलित होने का दंश

हमारे संविधान में सबको बराबरी का अधिकार है। सबसे कमजोर समुदायों के लिए कुछ विशेष प्रावधान भी हैं। पर इस सब के बावजूद आए दिन ऐसी खबरें आती हैं जो बताती हैं कि जाति की जकड़न, जाति का अहंकार और जातिगत उत्पीड़न का सिलसिला बदस्तूर कायम है।

Author June 11, 2018 4:48 AM
गुजरात के उना में दलितों की पिटाई वाले मामले में इस प्रकरण की जांच कर रही सीआईडी क्राइम ने बुधवार को अदालत में आरोप पत्र दायर कर दिया।

हमारे संविधान में सबको बराबरी का अधिकार है। सबसे कमजोर समुदायों के लिए कुछ विशेष प्रावधान भी हैं। पर इस सब के बावजूद आए दिन ऐसी खबरें आती हैं जो बताती हैं कि जाति की जकड़न, जाति का अहंकार और जातिगत उत्पीड़न का सिलसिला बदस्तूर कायम है। इसके सबसे ज्यादा शिकार दलित होते हैं। दलित सदियों से भेदभाव, अपमान और त्रास झेलते आए हैं। पर आज भी उन्हें यह सब सहना पड़े, तो यह हमारे लोकतांत्रिक होने पर सवालिया निशान है। दरअसल, ऐसी स्थिति एक बड़ी विडंबना को दर्शाती है, वह यह कि हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को भले अपना लिया हो, लोकतांत्रिक मूल्य हमारी सामाजिक चेतना का अंग नहीं बन पाए हैं, या वे हाशिये पर ही हैं। पिछले हफ्ते की अमदाबाद की एक घटना इस सिलसिले में गौरतलब है। अमदाबाद जिले के एक स्कूल में कुर्सी पर बैठने को लेकर एक दलित महिला पर कुछ लोगों ने हमला बोल दिया। आंगनवाड़ी में कार्यरत इस महिला को आधार कार्ड बांटने की जिम्मेदारी दी गई थी।

पर उसका कुर्सी पर बैठे होना एक स्थानीय व्यक्ति को इतना नागवार गुजरा कि उसने कुर्सी को पैर से मारा, जिससे वह महिला गिर पड़ी। पर इतने से उस व्यक्ति को संतोष नहीं हुआ, वह और कुछ दूसरे लोग उस महिला के घर पहुंचे और उसके परिवार के सदस्यों पर डंडों तथा धारदार हथियारों से हमला बोल दिया। पुलिस ने इस मामले में तीन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। हो सकता है जल्दी ही कुछ और आरोपी भी पकड़ लिये जाएं।

जाहिर है, यह कानून-व्यवस्था का कोई सामान्य मामला नहीं है। ऐसी घटनाएं प्रगति के हमारे दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। गुजरात की गिनती देश के अपेक्षया उन्नत राज्यों में होती है। इस संदर्भ में गुजरात मॉडल की भी काफी चर्चा हो चुकी है। पर क्या विकास का मतलब केवल बड़े बांध, फ्लाईओवर, एफडीआई वगैरह ही है, या इसमें समानता, भाईचारा, सामाजिक शांति और सौहार्द को भी शामिल किया जाना चाहिए? कोई अरसा नहीं बीता, जब उना कांड को लेकर गुजरात सुर्खियों में था। उसके बाद गुजरात में कभी किसी दलित को लंबी मूंछ रखने पर तो कभी किसी दलित को घुड़सवारी करने के कारण अगड़ों का कोपभाजन बनना पड़ा। अन्य राज्यों में भी दलित दूल्हे को घोड़ी या घोड़े पर चढ़ कर न जाने देना, दलित सरपंच को पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी को राष्ट्रीय ध्वज न फहराने देना, मिड-डे मील के वक्त दलित बच्चों को अलग बिठाया जाना आदि घटनाएं बताती हैं कि हमारे संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक हकीकत के बीच आजादी के सात दशक बाद भी कितनी चौड़ी खाई है।

यह खाई काफी हद तक पाटी जा सकी होती, अगर हमारे राजनीतिक दल दलितों के लिए सचमुच संजीदा होते। यों तो आए दिन उनके बीच दलितों की दुहाई देने की होड़ लगी रहती है, पर इसमें दिखावा ही अधिक होता है। प्रशासन और समूचे समाज को दलितों के प्रति संवेदनशील बनाना तो दूर, वे अपने अधिकतर कार्यकर्ताओं को भी वैसा नहीं बना पाए हैं। इसलिए दलित के नाम पर राजनीति में शोर चाहे जितना सुनाई दे, दलितों के कड़वे यथार्थ का सामना करने का माद्दा नहीं दिख रहा। हमारे राजनीतिक दल दलितों के वोट तो पाना चाहते हैं, पर उनके लिए कुछ खोने को यानी जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। क्या राजनीति का काम केवल सत्ता हासिल करना है, या समाज बदलना भी है?

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