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संपादकीयः कमाल की मिसाल

कचरे को र्इंधन के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, इंदौर नगर निगम इसकी मिसाल बन गया है। नगर निगम ने फल-सब्जियों के कचरे से बायो-सीएनजी गैस तैयार की और इससे सिटी बसें व ऑटो जैसे वाहन चलाने में कामयाबी हासिल कर ली।

Author June 13, 2018 5:15 AM
नगर निगम ने फल-सब्जियों के कचरे से बायो-सीएनजी गैस तैयार की और इससे सिटी बसें व ऑटो जैसे वाहन चलाने में कामयाबी हासिल कर ली।

कचरे को र्इंधन के रूप में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, इंदौर नगर निगम इसकी मिसाल बन गया है। नगर निगम ने फल-सब्जियों के कचरे से बायो-सीएनजी गैस तैयार की और इससे सिटी बसें व ऑटो जैसे वाहन चलाने में कामयाबी हासिल कर ली। प्रयोग के तौर पर दो सिटी बसें और बीस ऑटो इस र्इंधन से चल रहे हैं। कूड़ा प्रबंधन की दिशा में यह सफल प्रयोग ही नहीं, बड़ा कदम भी है। इंदौर नगर निगम अगले साल तक बड़े पैमाने पर बायो-सीएनजी का उत्पादन कर इससे सत्तर बसें चलाएगा। इसके कई फायदे हैं। सामान्य सीएनजी के मुकाबले कचरे से बनने वाली बायो-सीएनजी सस्ती पड़ेगी, इससे सिटी बसों पर होने वाले खर्च में कमी आएगी, गैस का उत्पादन शहर में लगे संयंत्रों में होगा और कचरा निपटान की समस्या से मुक्ति मिलेगी। शहर की आबोहवा सुधरेगी, वो अलग। गैस उत्पादन के लिए निगम ने फल-सब्जी मंडी में पहला जो संयंत्र लगाया है, उसमें बीस टन कचरे से एक हजार किलो बायो-सीएनजी रोजाना बनाई जा सकेगी। इस गैस का दाम सामान्य सीएनजी से पांच रुपए कम होगा। गैस बउत्पादन के बाद जो अपशिष्ट बचेगा उससे कंपोस्ट खाद बनाई जाएगी। इंदौर नगर निगम का यह प्रयोग ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।

भारत के ज्यादातर शहर कचरा निपटान की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। दिल्ली में कचरा-निस्तारण के लिए बने डंपिंग ग्राउंड बड़े-बड़े पहाड़ों में तब्दील हो गए हैं और वर्षों से हवा में जहर घोल रहे हैं। दूसरे शहरों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। ऐसे में इन शहरों को इंदौर से सीखना चाहिए कि कचरे को ऊर्जा के रूप में कैसे बदला जाए। ऐसा नहीं है कि इंदौर नगर निगम के पास ही इसकी समझ या तकनीक रही होगी, बाकी शहरों के नगर निगम इस बारे में अनजान हैं। मसला सिर्फ पहल करने और सकारात्मक रूप से आगे बढ़ने से जुड़ा है। हालांकि कुछ शहरों में इस दिशा में काम चल रहा है। कुछ साल पहले नवी मुंबई में प्रयोग शुरू हुआ। नवी मुंबई महानगर पालिका ने भी कचरे से बायो-सीएनजी गैस बनाने की पहल की। छत्तीसगढ़ के कांकेर शहर से निकलने वाले कचरे से उपयोगी सामान और बायो-सीएनजी गैस बनाने की योजना पर काम शुरू हुआ है। कचरा प्रबंधन के लिए नगर निगमों के सामने इससे अच्छा और आसान रास्ता शायद ही कोई हो।

पिछले कुछ सालों में वैश्विक निकायों और संगठनों की ओर से सबसे प्रदूषित शहरों की जो सूचियां आती रही हैं, उनमें भारत के शहरों का जिक्र सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। इसकी बड़ी वजह शहरों में कचरे से बढ़ता प्रदूषण भी है। शहरों में घरों से निकलने वाले कचरे की मात्रा ही सबसे ज्यादा होती है, जिसके निस्तारण में ज्यादातर स्थानीय निकाय नाकाम रहते हैं। ऐसे में इंदौर से सबक लेने की जरूरत है। छोटे-छोटे शहरों में इस तरह के बायो-गैस संयंत्र लगाए जा सकते हैं और इनसे बिजली और गैस बनाई जा सकती है। यह कोई मुश्किल काम नहीं है। लेकिन आश्चर्य है कि आजादी के सात दशक बाद भी भारत में एक शहर ऐसा नहीं है जो पूरी तरह कचरे का इस्तेमाल गैस और बिजली बनाने में कर रहा हो। इसके लिए पहल सरकारों को ही करनी होगी।

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