ताज़ा खबर
 

संपादकीयः शिलांग की चिनगारी

शिलांग में जिस तरह हिंसा फैली, उससे स्पष्ट है कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भनक तक नहीं लग पाई कि खासी लोग भीतर ही भीतर सुलग रहे हैं।

Author June 6, 2018 4:01 AM
शिलांग की इस हिंसा की वजह एक तात्कालिक विवाद है।

मेघालय की राजधानी शिलांग पांच दिन से कर्फ्यू की गिरफ्त में है। हिंसक घटनाएं जारी हैं। हालात से निपटने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को बुलाना पड़ा है। केंद्र ने सीआरपीएफ के एक हजार जवान भेजे हैं। इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक मामूली-सी घटना इतना बड़ा और हिंसक रूप ले लेगी, शायद ही किसी ने सोचा होगा। स्थिति शायद इतनी बिगड़ता नहीं। लेकिन जिस तेजी से अफवाहें फैलीं, उसने आग में घी का काम किया। अफवाहें न फैलें इसलिए मोबाइल, इंटरनेट और एसएमएस जैसी संचार सेवाएं फिलहाल बंद हैं। फिर भी हालात बेकाबू हैं। खासी युवकों की भीड़ रात को मौका पाते ही हमला करने से नहीं चूक रही। पुलिस और सीआरपीएफ तक को निशाना बनाया गया। यह सब क्यों हुआ?

शिलांग की इस हिंसा की वजह एक तात्कालिक विवाद है। कहा जा रहा है कि शुरुआत खासी समुदाय के एक युवक और पंजाबी महिला के बीच झगड़े से हुई। यह भी कहा जा रहा कि खासी समुदाय का युवक सरकारी बस में था, जिसे उसका एक रिश्तेदार चला रहा था। इस युवक के साथ थेम मेटोर इलाके के निवासियों ने मारपीट की थी। यह विवाद इलाके में बस खड़ी करने को लेकर शुरू हुआ था। इसी बीच यह अफवाह फैला दी गई कि खासी समुदाय के जिस युवक को पीटा गया, उसकी मौत हो गई। फिर लोग भड़क उठे। घटना कुछ भी रही हो, बवाल के मूल में पुराने विवाद हैं। खासी समुदाय के लोग दूसरे राज्यों से आए लोगों को लेकर लंबे समय से नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। लेकिन इस तरह की घटनाएं कुछ दिन की अशांति के बाद दब जाती थीं, तो लगता था कि मामला शांत हो गया। लेकिन सतह के नीचे आग जलती रही।

शिलांग में जिस तरह हिंसा फैली, उससे स्पष्ट है कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भनक तक नहीं लग पाई कि खासी लोग भीतर ही भीतर सुलग रहे हैं। पुलिस पर पथराव, सीआरपीएफ के ठिकाने पर भीड़ का हमला, रात को हमले करने की रणनीति, आगजनी जैसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए शिलांग के बाहरी इलाकों से बड़ी संख्या में खासी समुदाय के प्रदर्शनकारी घुस आए थे। खुफिया तंत्र खतरे को भांप पाने में क्यों नाकाम रहा? इस तरह की हिंसा अचानक नहीं, बल्कि सुनियोजित होती है। शिलांग में सिखों और खासी समुदाय के बीच संघर्ष कोई नया नहीं है। खासी समुदाय शिलांग में सिख समुदाय की एक बस्ती को हटाने की लंबे समय से मांग कर रहा है। इस बस्ती में रह रहे सिख सौ-डेढ़ सौ साल पहले यहां आकर बसे थे। लेकिन अब सिख समुदाय का यहां कारोबार पर कब्जा है। खासी समुदाय अब पहले की तुलना में आज काफी जागरूक और शिक्षित हो चुका है। इसलिए खासी समुदाय सिखों को निकालने की मांग करता आ रहा है। हालांकि सरकार ने यह साफ किया है कि शिलांग की हिंसा सांप्रदायिक नहीं है। लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि दूसरे राज्यों से आए लोगों के प्रति स्थानीय खासी समुदाय में आक्रोश व्याप्त है जो समय-समय पर हिंसा के रूप में भी सामने आता है। इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था के चश्मे से देखना स्थिति का सतही आकलन होगा। सवाल है कि राजनैतिक नेतृत्व कोई सौहार्दपूर्ण पहल करने में क्यों नाकाम रहा है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App