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संपादकीय: अर्थ की व्यवस्था

आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सालाना कार्यक्रम में बातचीत करते हुए कहा कि संकट की स्थितियों को देखते हुए हमें अपनी नीतियों में संशोधन पर विचार करना होगा। उन्हें उद्योग जगत पर पूरा भरोसा है कि वह अर्थव्यवस्था को संभालने में सक्रिय योगदान करेगा।

Author Published on: July 13, 2020 4:46 AM
RBI, Governner, Economyरिजर्व बैंक ने अब कारोबारी पूंजी के लिए कर्ज की शर्तें आसान कर दी हैं।

संकट के इस दौर में दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं। भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में कई राज्यों को दुबारा पूर्णबंदी का फैसला करना पड़ रहा है। इस तरह अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटाने का संकल्प स्वाभाविक रूप से बाधित हो रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

कोरोना संकट से पार पाने के लिए चलाई जा रही तमाम योजनाओं के लिए अर्थ की व्यवस्था करने का दायित्व उसी पर है। बाजार में किस तरह गति आए और औद्योगिक उत्पादन बढ़े, लोगों की क्रय शक्ति बेहतर हो, इसके लिए उसे अपनी नीतियों को लेकर लगातार मंथन करना पड़ रहा है। पिछले कुछ दिनों में उसने कई बार बैंक दरों में कटौती कर बैंकिंग कारोबार को बढ़ावा देने के भरसक प्रयास किए हैं, पर सकल घरेलू उत्पादन के नीचे ही रहने की आशंका बनी हुई है। पर संतोष की बात है कि आरबीआइ ने अर्थव्यस्था में सुधार को लेकर हिम्मत नहीं हारी है।

आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सालाना कार्यक्रम में बातचीत करते हुए कहा कि संकट की स्थितियों को देखते हुए हमें अपनी नीतियों में संशोधन पर विचार करना होगा। उन्हें उद्योग जगत पर पूरा भरोसा है कि वह अर्थव्यवस्था को संभालने में सक्रिय योगदान करेगा। अपनी बातचीत में उन्होंने इस संकट काल में उद्योग जगत के उत्साहजनक प्रयासों की सराहना भी की।
दरअसल, सरकार को सबसे अधिक भरोसा उद्योग जगत पर ही है, क्योंकि जीडीपी में सबसे अधिक निर्णायक योगदान उसी का होता है। पर पूर्णबंदी की वजह से खासकर छोटे, मंझोले और सूक्ष्म उद्योगों पर बुरी मार पड़ने के चलते रोजगार और अर्थव्यवस्था की गति पर सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ा है।

वाहन, कपड़ा, खनन, बिजली उत्पादन जैसे बड़े उद्योग भी इसकी चपेट में आए हैं। हालांकि पूर्णबंदी के बाद सरकार ने उद्योग जगत को यथायोग्य रियायतें और राहत पैकेज दिए, पलायन कर गए मजदूरों के लिए भी योजनाएं शुरू की हैं। आयात पर शिकंजा कसने और देशी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आत्मनिर्भर योजना शुरू की गई है, ताकि घरेलू बाजार को बल मिल सके। पर वे सब अभी तक अपर्याप्त ही नजर आ रहे हैं। हालांकि कई जगह अपने गांव लौटे मजदूरों के वापस शहरों की तरफ लौटने की खबरें भी आई हैं, पर जब तक उद्योग जगत की गति वापस नहीं लौटती, तब तक अर्थव्यस्था को संभालने की चुनौतियां बनी रहेंगी।

आरबीआइ गवर्नर बेशक नीतियों में परिवर्तन को लेकर लचीला रुख अपनाए हुए और बैंकों को उत्साहित करने का प्रयास कर रहे हैं, पर इसे संभालना आसान नहीं रह गया है। राहत पैकेज में जो घोषणाएं की गई हैं, उनमें एमएसएमइ के कामगारों के भविष्यनिधि में अंशदान का दायरा बढ़ाने से लेकर आसान शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराने तक की योजनाएं हैं। उन सबके लिए पैसे का प्रबंध कहां से हो, यह बड़ा सवाल है।

राजस्व घाटा पहले ही चिंताजनक स्तर पर है। कारोबारी क्षेत्र में मंदी का दौर कोरोना संकट से पहले से चला आ रहा है, जिसके चलते बैंकिंग क्षेत्र में सुस्ती है। एनपीए बढ़ता जा रहा है, तो बैंकों की बहुत सारी आरक्षित पूंजी भी प्रवाहित की जा चुकी है। ऐसे में यह हौसला तो अच्छी बात है कि अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सारे प्रयास हो रहे हैं, पर यह किस हद तक संभल पाएगी, यह प्रश्न अनुत्तरित है।

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