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संपादकीयः जांच का दायरा

प्रधानमंत्री ने दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी से पैदा स्थितियों की समीक्षा बैठक की है। देश के करीब अस्सी फीसद सक्रिय मामले इन्हीं राज्यों में हैं।

मार्च में जब संक्रमण फैलना शुरू हुआ, तो संकल्प लिया गया था कि इसे महीने भर के भीतर काबू में कर लिया जाएगा।

यह निस्संदेह संतोष का विषय है कि दुनिया के दूसरे देशों की अपेक्षा भारत में कोरोना संक्रमितों के स्वस्थ होने की दर काफी ऊंची और मृत्यु का आंकड़ा बहुत कम है। मगर जिस तरह संक्रमण पर काबू पाना अब भी चुनौती बना हुआ है, उसे लेकर प्रधानमंत्री की चिंता स्वाभाविक है। मार्च में जब संक्रमण फैलना शुरू हुआ, तो संकल्प लिया गया था कि इसे महीने भर के भीतर काबू में कर लिया जाएगा। तब दूसरे देशों के अनुभव भी हमारे सामने थे। इसी वजह से पूर्णबंदी का कदम उठाया गया था, ताकि लोगों का मेलजोल कम रहे और संक्रमण न फैलने पाए, पर पूर्णबंदी का मकसद पूरी तरह कामयाब नहीं रहा। चूंकि पूर्णबंदी को लंबे समय तक जारी रखना संभव नहीं था, इसलिए चरणबद्ध तरीके से उसे खोला गया। बंदी खुलने के बाद ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत रेखांकित की गई। हालांकि पिछले दो महीनों में जांच में तेजी आई, इलाज की सुविधाएं बढ़ाई गई और चिकित्सीय अनुभव भी विस्तृत हुए, लेकिन इस दौरान संक्रमण की रफ्तार चिंताजनक होती गई। जब तक इस पर काबू नहीं पाया जाता, स्थितियां सामान्य होने की उम्मीद धुंधली ही बनी रहेगी। इसलिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ताजा बैठक में प्रधानमंत्री की चिंता समझी जा सकती है।

प्रधानमंत्री ने दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी से पैदा स्थितियों की समीक्षा बैठक की है। देश के करीब अस्सी फीसद सक्रिय मामले इन्हीं राज्यों में हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर इन राज्यों में कोरोना पर काबू पा लिया गया, तो इस महामारी से जीतना आसान हो जाएगा। ये राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार, गुजरात, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक। इनमें से प्रधानमंत्री ने बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में जांच में तेजी लाने की जरूरत रेखांकित की। छिपी बात नहीं है कि इन राज्यों में अब तक जांच और इलाज में अपेक्षित गति नहीं आ पाई है। बिहार में शुरुआती चरण में ही घोर लापरवाही बरती गई। उत्तर प्रदेश में भी इस मामले में सुविधाएं बढ़ाने के बजाय आंकड़ों को दबाने पर जोर अधिक देखा गया। जब दूसरे प्रदेशों और शहरों से प्रवासी मजदूरों की वापसी बढ़ी, तो बिहार और उत्तर प्रदेश में संक्रमण का खतरा बढ़ने की आशंका सबसे अधिक जताई गई थी, पर वहां की सरकारों ने गंभीरता नहीं दिखाई। उसका नतीजा यह हुआ कि इन दोनों राज्यों में तेजी से संक्रमण फैला। पश्चिम बंगाल में शुरू में ही अपेक्षित जांच न हो पाने को लेकर चिंता जताई गई थी और वहां केंद्रीय दल भेजा गया, तब वहां की मुख्यमंत्री ने इसे राजनीतिक रुख दे दिया था। गुजरात में राज्य सरकार की शिथिलता की वजह से इस मामले में कामयाबी नहीं मिल पा रही।

स्वास्थ्य का मामला चूंकि राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, इसलिए कोरोना महामारी से निपटने में स्वाभाविक ही उनसे तत्परता की अपेक्षा की जाती है। कई राज्यों ने इस मामले में उल्लेखनीय काम किए हैं। पर कुछ राज्यों में थोड़ी शिथिलता देखी गई, जिसकी वजह से संक्रमण की गति रोकने में मुश्किल बनी हुई है। पर अब भी अगर सक्रियता बरती जाए, तो इसे नियंत्रण में लाना कठिन काम नहीं है। प्रधानमंत्री का यह संकल्प कि मृत्यु दर को एक फीसद से ऊपर नहीं जाने देना है, पूरा हो सकता है। पर केंद्र से भी इस मामले में राज्यों को जरूरी आर्थिक और चिकित्सीय मदद उपलब्ध कराने पर गंभीरता से विचार अपेक्षित है।

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