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विष वमन

यह भी कम विडंबना नहीं है कि भाजपा ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम चलाया जिसमें लोगों को संविधान रक्षा की शपथ दिलाई गई। मगर जब खुद पार्टी के लोग संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहे हों, तो ऐसे कार्यक्रम का क्या अर्थ रह जाता है?

Author नई दिल्ली | March 2, 2016 2:10 AM
रामशंकर कठेरिया (FILE PHOTO)

मानव संसाधन राज्यमंत्री और आगरा से सांसद रामशंकर कठेरिया के रविवार को दिए भाषण को लेकर स्वाभाविक ही संसद में हंगामा हुआ और सरकार को फजीहत झेलनी पड़ी। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता अरुण माहौर की हत्या हो गई। आरोप है कि हत्यारा कोई मुसलिम युवक था। माहौर को श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाई गई सभा में वक्ताओं ने एक के बाद एक मुसलिम समुदाय को सबक सिखाने की बात कही, उन्हें राक्षस और रावण की संतान करार देते हुए हिंदुओं का आह्वान किया कि उन्हें घेरने तथा बर्बाद करने के लिए तैयार हो जाएं। धमकी दी गई कि बदला लेने की तैयारी कर ली गई है। सभा के मंच पर संघ परिवार के कई स्थानीय नेताओं समेत कठेरिया और फतेहपुर सीकरी से भाजपा के सांसद बाबूृलाल भी मौजूद थे। इन दोनों ने भी अपने भाषण में एक खास समुदाय के खिलाफ विष वमन किया। कठेरिया ने यहां तक कहा कि प्रशासन यह न समझे कि मंत्री बन जाने से उनके हाथ बंधे हुए हैं। मुसलिम समुदाय के बारे में विहिप की क्या सोच-समझ है और उनके प्रति वह कैसी भाषा इस्तेमाल करती रही है यह किसी से छिपा नहीं है। फिर, जब अपने एक कार्यकर्ता की हत्या हो गई हो, तो गम के साथ गुस्से को भी समझा जा सकता है। लेकिन इस प्रकरण में दो सवाल उठते हैं। एक यह कि क्या संघ परिवार को न्याय की सभ्य और आधुनिक परिभाषा में तनिक विश्वास नहीं है? दुनिया भर में न्यायिक सिद्धांत यह है कि किसी के किए की सजा केवल उसी को दी जा सकती है, उसके परिवार या उसकी जाति या उसके समुदाय को नहीं। लेकिन सांप्रदायिक सोच इससे उलट चलती है। दूसरा सवाल यह कि क्या विधायक, सांसद और मंत्री को भी कानून के शासन में भरोसा नहीं है? फिर वे क्यों विधायिका का अंग बने हुए हैं? इन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ भले ले रखी है, पर सभा में मौजूद दोनों सांसदों और एक विधायक को इस शपथ को तार-तार करते कोई संकोच नहीं हुआ।

यह भी कम विडंबना नहीं है कि भाजपा ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम चलाया जिसमें लोगों को संविधान रक्षा की शपथ दिलाई गई। मगर जब खुद पार्टी के लोग संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहे हों, तो ऐसे कार्यक्रम का क्या अर्थ रह जाता है? अरुण माहौर के हत्यारे को जल्द से जल्द पकड़ा जाना चाहिए और फिर न्यायिक कार्यवाही जल्द से जल्द तर्कसंगत परिणति तक पहुंचनी चाहिए। भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश में भले न हो, केंद्र में तो है। केंद्रीय गृह मंत्रालय राज्य सरकार से जवाब तलब कर सकता है, और भी तरीकों से कार्रवाई सुनिश्चित कर सकता है। पर लगता है संघ परिवार की दिलचस्पी अरुण माहौर को श्रद्धांजलि के बहाने मुसलिम समुदाय को घेरने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा देने में ज्यादा है। हैरत की बात नहीं कि भाजपा ने कठेरिया को क्लीन चिट दे दी। पर एक केंद्रीय मंत्री के बेहद आपत्तिजनक बयान के लिए पार्टी के साथ-साथ प्रधानमंत्री भी जवाबदेह हैं। प्रधानमंत्री ने लाल किले से स्वाधीनता दिवस के अपने पहले संबोधन में ही आह्वान किया था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति-धर्म के झगड़े भूल जाएं। पर उनके अपने ही लोगों को यह गवारा नहीं है। क्या यह सोचा-समझा खेल है कि मोदी दुनिया को सुनाने के लिए भली-भली बातें कहते रहें और व्यवहार में इससे उलट एजेंडे को आगे बढ़ाया जाए? सबका साथ सबका विकास का नारा क्या इसी तरह फलीभूत होगा!

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