राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास में कथित गबन का मामला जब से सामने आया है, तभी से इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि इसमें शामिल आरोपियों के खिलाफ उचित कार्रवाई के समांतर एक संपूर्ण पारदर्शी व्यवस्था बननी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की कोई गड़बड़ी संभव न हो सके।
विडंबना यह है कि इस मामले के खुलासे के बाद जहां न्यास के दायरे में जिम्मेदारी तय किए जाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी, वहां शुरू से आरोपों की दिशा भ्रमित करने की कोशिश होती रही। अब सोमवार को न्यास की एक अहम बैठक के दौरान इसके महासचिव चंपत राय और न्यासी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए और अंतरिम व्यवस्था के तौर पर एक अन्य सदस्य कृष्ण मोहन को महासचिव की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई।
निश्चित तौर पर यह कदम विवाद के बीच जिम्मेदारी और आरोपियों के प्रति नरमी बरतने को लेकर उठते गंभीर सवालों की तीव्रता को कम करने की एक कवायद है, लेकिन इस बीच जैसी असहज करने वाली स्थितियां पैदा हुईं, उसने आम लोगों के भरोसे को कमजोर ही किया है।
इस संबंध में अब तक सामने आए आरोप-प्रत्यारोपों के बाद स्थिति इतनी उलझ गई है कि जब तक विशेष जांच दल की अंतिम रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक एक तरह की अस्पष्टता कायम रहेगी।
विडंबना यह है कि न्यास के जिन लोगों पर इसके वित्त की निगरानी, उसमें पारदर्शिता सुनिश्चित करने और इसकी संपत्तियों की रक्षा करने का दायित्व था, या तो उनके लिए ये तकाजे गैर-महत्त्वपूर्ण थे या फिर वे ही कठघरे में खड़े दिखे।
सवाल है कि आरोपों की अनदेखी करके क्या अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा जा सकता है! इतने समय तक किसकी देखरेख या संरक्षण में चढ़ावे की चोरी करने वालों का धंधा बेरोक-टोक चलता रहा? क्या यह उन तमाम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है, जिनकी आस्था की बुनियाद पर ही न्यास का समूचा कामकाज टिका हुआ है?
लोगों के भरोसे को ताक पर रखकर पैसों का गबन करने की हरकत कैसे संभव हुई? अब यह देखने की बात होगी कि इस अनियमितता के वास्तविक आरोपियों को कानून के कठघरे में खड़ा करके सजा दिलाई जाती है या नहीं?
हालांकि न्यास के नए महासचिव का कहना है कि चंदा चोरी के मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसे सजा दिलाना उनकी प्राथमिकता होगी। निश्चित रूप से सिर्फ इस्तीफा इस मामले का हल नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार कानून के दायरे में एक परिभाषित अपराध है, तो उसके लिए सजा भी निर्धारित है। जांच में जिन लोगों को वास्तव में जिम्मेदार पाया जाएगा, उन्हें कानून के मुताबिक सजा दिलाना इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी होनी चाहिए।
यों अनियमितता का जैसा स्वरूप सामने आया है, उसके मद्देनजर अब देश भर के लोगों की नजर इस पर रहेगी कि मंदिर में चढ़ावे, खर्च और वित्तीय खातों की निगरानी सहित न्यास के सभी कामकाज के प्रबंधन और संचालन के लिए जो नई व्यवस्था बनाई जाएगी, उसमें संपूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ-साथ उन कमियों को दूर करने के लिए क्या किया जाता है, जिनकी वजह से न्यास के कोष में इतनी व्यापक गड़बड़ी हुई।
राम मंदिर का दर्शन और वहां दान करना करोड़ों लोगों की आस्था का मामला है। मगर इस समूचे मामले की वजह से आम लोगों के भीतर न्यास को लेकर एक तरह का अविश्वास पैदा हुआ है और उसकी छवि को चोट पहुंची है।
