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अनुपस्थित प्रतिनिधि

विचित्र है कि जिन मामलों में सांसदों को खुद सतर्कता बरतनी और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, उनके लिए प्रधानमंत्री को फटकार लगानी पड़ी है

Author March 23, 2017 5:28 AM
राज्यसभा की कार्यवाही का नज़ारा

संसद सत्र के दौरान सांसदों के अनुपस्थित रहने की प्रवृत्ति पुरानी है। यहां तक कि कई मंत्री भी उपस्थिति रहना जरूरी नहीं समझते। इसके चलते सदन में पूछे जाने वाले सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। कई बार कोरम पूरा न हो पाने के चलते सदन की कार्यवाही में बाधा उपस्थित होती है। मंगलवार को कुछ ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई, जब राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूछे जाने वाले पूरक प्रश्नों के जवाब देने के लिए संबंधित विभागों के कई मंत्री उपस्थिति नहीं थे। इस पर सभापति हामिद अंसारी ने नाराजगी जाहिर की, तो विपक्ष को चुटकी लेने का मौका मिल गया। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल की बैठक में प्रतिनिधियों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने पार्टी सांसदों को संसद सत्र के दौरान पूरे समय सदन में उपस्थित रहने की कड़ी नसीहत दी। उन्होंने यहां तक कहा कि वे कभी भी किसी सांसद को अचानक बुला सकते हैं।

अगर वे देश से बाहर हैं तब भी किसी अधिकारी की मार्फत किसी भी सांसद से बात कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि इस मामले में वे सिर्फ नसीहत देकर कर्तव्य पूरा नहीं मान लेने वाले। वे लगातार अपनी पार्टी के सदस्यों पर नजर रखेंगे। अगर कोई व्यक्ति सदन में उपस्थिति न होकर संसद में कहीं और बैठा हुआ है, तो भी उसे अनुपस्थित माना जाएगा। इस कड़ाई से शायद सांसदों की मनमानी पर कुछ अंकुश लगे। यह ठीक है कि जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों के जिम्मे बहुत सारे काम होते हैं, पर इस आधार पर उन्हें सदन की कार्यवाही से बाहर रहने की छूट नहीं मिल जाती। जनप्रतिनिधि का काम सदन को अपने क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराना, उनके हल के लिए उपाय सुझाना और दूसरे सांसदों की तरफ से उठाए गए प्रश्नों, समस्याओं आदि के संबंध में सरकार की तरफ से की गई कार्रवाई आदि को जानना-समझना, उस पर टिप्पणी करना भी है।

मगर बहुत सारे सांसद सदन की चर्चा में शामिल होना तो दूर, अपने क्षेत्र की समस्याएं भी सदन के समक्ष रखना जरूरी नहीं समझते। सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि अक्सर इसलिए चुप्पी साधे रखते हैं कि कहीं उनके सवालों से सरकार के सामने असहज स्थिति न पैदा हो जाए या फिर उनकी कोई बात उनके वरिष्ठ नेताओं को नागवार गुजरे। इसलिए अक्सर वे सदन से बाहर रहते हैं। मगर इसके चलते कई बार सरकार को मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता है, जैसा कि मंगलवार को हुआ। कई अहम विधेयकों पर सरकार का पक्ष कमजोर हो जाता है। संसद सत्र के दौरान करोड़ों रुपए सरकारी खजाने से खर्च होते हैं। इसके लिए बाकायदा सांसदों के लिए भत्ता तय है।

फिर कई तरह की व्यवस्थाओं पर खर्च होता है। ऐसे में सांसदों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे सदन में उपस्थित रहें। संसद सत्र के अलावा बाकी के दिन उन्हें दूसरे कामों के लिए मिलते हैं, वे उसके अनुसार अपना कार्यक्रम बना सकते हैं। मगर देखा जाता है कि बहुत सारे सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी कम ही जाते हैं।इसके चलते सरकार की कई योजनाओं और फैसलों की सही-सही जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पाती। जनप्रतिनिधियों की इस प्रवृत्ति पर भी प्रधानमंत्री ने सांसदों को नसीहत दी। विचित्र है कि जिन मामलों में सांसदों को खुद सतर्कता बरतनी और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, उनके लिए प्रधानमंत्री को फटकार लगानी पड़ी है। ऐसी कड़ाई की दरकार दूसरे दलों से भी है।

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