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मौत के अस्पताल

गोरखपुर में जहां आॅक्सीजन के अभाव के चलते बच्चों की मौत हो गई, वहीं रायपुर के अस्पताल में आॅक्सीजन की उपलब्धता के बावजूद आपूर्ति में लापरवाही की वजह से यह त्रासदी सामने आई।

Author August 23, 2017 5:30 AM
गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ज्यादातर बच्चों को इंसेफलाइटिस की वजह से भर्ती कराया गया था। (Express photo by Vishal Srivastav 12.08.2017)

गोरखपुर में आॅक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने की वजह से तीस से ज्यादा बच्चों की मौत की खबर अभी ठंडी भी नहीं हुई कि छत्तीसगढ़ के रायपुर से भी इसी वजह से तीन नवजात शिशुओं की जान जाने की घटना सामने आ गई। जिस अस्पताल में बीमार बच्चों की जिंदगी आॅक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर हो और वहां इससे संबंधित कर्मचारी शराब पीकर नशे में डूबा सो रहा हो, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि व्यवस्था के स्तर पर वहां कैसी अराजकता रही होगी। आखिर उस अस्पताल में किस तरह के नियम-कायदे हैं और निगरानी की क्या व्यवस्था है कि किसी कर्मचारी को ड्यूटी के दौरान भी शराब पीकर नशे में डूब जाने का मौका मिल जाता है? उस कर्मचारी को इस बात का अहसास तक क्यों नहीं हो पाता कि उसकी लतकी वजह से मरीजों की जान कभी भी जा सकती है? गौरतलब है कि गोरखपुर में जहां आॅक्सीजन के अभाव के चलते बच्चों की मौत हो गई, वहीं रायपुर के अस्पताल में आॅक्सीजन की उपलब्धता के बावजूद आपूर्ति में लापरवाही की वजह से यह त्रासदी सामने आई।

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विडंबना यह है कि ऐसी हर घटना के बाद अमूमन समूचा तंत्र इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय उसकी वजहों पर पर्दा डालने या फिर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने में लग जाता है। रायपुर के आंबेडकर अस्पताल में जब आॅक्सीजन कम होने की वजह से बच्चों की मौत की घटना सामने आई तो वहां के डॉक्टरों से लेकर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव तक ने यह सफाई पेश कर दी कि बच्चों की मौत आॅक्सीजन की आपूर्ति बंद होने से नहीं, बल्कि बीमारी की वजह से हुई। जब प्रबंधन से जुड़े डॉक्टरों और अधिकारियों की ओर से यह सफाई पेश की जा रही थी, तब क्या यह तथ्य उनसे अनजान था कि जिन बच्चों की जान गई, उन्हें वहां बीमारी की हालत में इलाज के लिए ही लाया गया था? जबकि आॅक्सीजन की आपूर्ति करने वाले कक्ष में कर्मचारी के शराब के नशे में धुत होने के तथ्य को सभी मान रहे हैं। सवाल है कि अगर आॅक्सीजन आपूर्ति जैसी जीवन-रक्षण प्रणाली से जुड़े तंत्र की ड्यूटी पर तैनात कोई कर्मचारी इस कदर लापरवाही बरते तो इसके लिए अंतिम जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी!

सरकारी अस्पतालों में ऐसी आपराधिक लापरवाही क्या इसलिए बरती जाती है कि वहां इलाज के लिए जाने वाले अमूमन सभी लोग गरीब तबके के होते हैं और अपने साथ होने वाली नाइंसाफी को चुपचाप सह लेते हैं? किसी भी अस्पताल में मरीजों की तीमारदारी के लिए तैनात कर्मचारियों में पेशेवर कुशलता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। वे अपनी ड्यूटी में जरा भी लापरवाही नहीं बरतें, यह सुनिश्चित होना अनिवार्य है। यों अस्पताल में आए मरीजों और उनके परिजनों का यह अधिकार भी है कि वे वहां के कर्मचारियों से सेवा की कसौटी पर खरा उतरने की उम्मीद करें। रायपुर अस्पताल में तीन बच्चों की मौत से साफ है कि देश भर में चिंता का विषय बनी गोरखपुर की घटना दूसरी जगहों पर अस्पतालों में पर्याप्त सावधानी और संवेदनशीलता पैदा नहीं कर सकी। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़, दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जो सबका साथ सबका विकास के नारे में यकीन करती हैं। सबका विकास तो दूर, क्या वे सबके प्रति संवेदनशील होने का भी दावा कर सकती हैं?

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