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बरसात में बदहाली

अब यह जैसे हर साल का सिलसिला बन चुका है कि बरसात शुरू होते ही शहर जलमग्न नजर आने लगते हैं। जगह-जगह पहाड़ों के खिसकने, सड़कों-पुलों के धंसने और बादल फटने से तबाही होने लगती है। इस बार मानसून की शुरुआती बारिश में ही अफरा-तफरी मच गई। अनेक शहरों के मुहल्लों में बाढ़ की-सी स्थिति […]

Author July 14, 2015 18:05 pm

अब यह जैसे हर साल का सिलसिला बन चुका है कि बरसात शुरू होते ही शहर जलमग्न नजर आने लगते हैं। जगह-जगह पहाड़ों के खिसकने, सड़कों-पुलों के धंसने और बादल फटने से तबाही होने लगती है। इस बार मानसून की शुरुआती बारिश में ही अफरा-तफरी मच गई। अनेक शहरों के मुहल्लों में बाढ़ की-सी स्थिति पैदा हो गई, तो कई नदियों का जल-स्तर खतरे के निशान को छूने लगा। विभिन्न राज्यों से लोगों के मरने की खबरें भी आ गर्इं। दिल्ली के करीब बानवे इलाकों में ऐसा जलजमाव रहा कि लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया।

कुछ मुहल्लों में पानी भर जाने की वजह से लोगों को सामुदायिक भवनों में शरण लेनी पड़ी। पिछले कुछ सालों से कमोबेश यही स्थिति हर बारिश में रहने लगी है। राजनीतिक पार्टियां जलनिकासी की व्यवस्था ठीक न होने का ठीकरा सरकारों और नगरपालिकाओं के सिर फोड़ने की कोशिश करती हैं। मगर कोई ऐसा व्यावहारिक उपाय नहीं निकाला जाता कि जलजमाव की स्थिति बने ही नहीं। सड़कों और गलियों में बरसात का पानी भर जाने की वजहें छिपी नहीं हैं। हर साल बरसात शुरू होने से पहले नालियों की सफाई के अभियान चलाए जाते हैं, मगर उनका कोई सकारात्मक नतीजा नजर नहीं आता। पिछले दस महीनों से देश भर में स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद झाड़ू लगा कर इस कार्यक्रम की शुरुआत की तो तमाम मंत्री, नेता और अधिकारी झाड़ू लगाते फोटो खिंचवाने में जुट गए। मगर इसका कितना असर हो रहा है, यह अंदाजा लगाने की किसी ने कोशिश नहीं की। महज तीन दिन की बारिश में देश के विभिन्न इलाकों में हुए भारी जलजमाव ने इस अभियान की पोल खोल दी है।

इसी तरह सामान्य बारिश में भी नदियों का जल-स्तर खतरे के निशान तक पहुंच जाने, पहाड़ों के खिसकने, बादल फटने आदि की वजहें छिपी नहीं हैं। पहाड़ों पर पर्यटन और विकास परियोजनाओं आदि के नाम पर सड़कों-होटलों-मोटलों के निर्माण, बिजली कारखानों वगैरह के लिए अतार्किक तोड़-फोड़ के चलते तबाही की स्थिति बन गई है। जब-तब बादल फटने की घटनाओं की वजहें भी उजागर हैं।

उत्तराखंड में केदारनाथ की विभीषिका के बाद तमाम अध्ययनों से पहाड़ों पर संभावित खतरों का खुलासा हो चुका है। नदियों का पेटा उथला होते जाने के कारण सामान्य बरसात में भी बाढ़ की स्थिति बन जाती है। शहरों के विस्तार के कारण धरती की ऊपरी परत का बड़ा हिस्सा कंक्रीट से ढंकता जा रहा है। ऐसे में बरसात का पानी बह कर नदियों में जाता है, जबकि उनकी जल संग्रहण क्षमता लगातार घटती गई है।

इसलिए नदियां उफन कर तटवर्ती शहरों तक फैल जाती हैं। शहरों का जलनिकास अवरुद्ध हो जाता है। इस मौसम में सामान्य से थोड़ी ही अधिक बारिश दर्ज हुई, फिर भी दिल्ली समेत उत्तर भारत की अनेक नदियां इस पानी को संभाल नहीं पार्इं। शहरों की रफ्तार थम गई। अभी भारी बरसात के दिन आने वाले हैं। अगर इसी तरह पानी बरसता रहा तो क्या स्थिति होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। विचित्र है कि शहरों के विकास पर तो बहुत जोर दिया जाता है, पर जलनिकासी जैसी बुनियादी जरूरतों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। साफ-सफाई का मतलब केवल शहरों के कुछ संभ्रांत इलाकों में झाड़ू-बुहारी लगा देना भर मान लिया गया है। नालियों में भर रही गाद और कचरे को रोकने और निकालने का पुख्ता इंतजाम नहीं होता। क्या स्वच्छता अभियान के दायरे में यह सब नहीं आता!

 

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