भारतीय रेलवे के बारे में अक्सर यह दावा किया जाता है कि इसके समग्र संचालन को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सेवा के समकक्ष बनाया जाएगा। मगर हकीकत यह है कि हादसों, सफर के दौरान निर्धारित समय पर गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने से लेकर ट्रेन के भीतर साफ-सफाई और खानपान के मामले में कई बार स्थिति बेहद दयनीय और खराब दिखती है।

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जिन ट्रेनों को विशेष सुविधा वाला बताया जाता है, उनमें परोसा गया भोजन भी अक्सर खराब निकल जाता है और यात्री ठगे-से रह जाते हैं। खबरों के मुताबिक, हर रोज पैंतीस से ज्यादा लोग रेलवे के खराब खाने को लेकर शिकायत करते हैं।

खाने में तिलचट्टा, दूसरे कीड़ों या अखाद्य वस्तुओं के मिलने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। साथ ही, भोजन की मात्रा और तय कीमतों से ज्यादा राशि वसूलने की समस्या भी आम देखी जा सकती है। सवाल है कि अगर उच्च गुणवत्ता और सेवा का दावा करके खाने-पीने के मामले में भी लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है, तो उसे कैसे देखा जाएगा।

सफर के दौरान यात्री थोड़ी सुविधा के लिए ट्रेन में मिलने वाला खाना पैसा चुका कर लेना चाहते हैं। कई ट्रेनों में सफर के दौरान टिकट के साथ खाने-पीने के सामान के लिए राशि चुकाने का भी विकल्प है। मगर विडंबना यह है कि पूरी कीमत चुकाने के बावजूद कई लोगों की थाली में ऐसा खाना होता है, जिसे खाया नहीं जा सकता।

ट्रेनों में मिलने वाले खराब खाने को लेकर आए दिन शिकायतें आती रहती हैं और कई बार विवाद भी होते हैं। ऐसी खबरें भी सामने आई, जिनमें भोजन के खराब होने पर आपत्ति जताने पर ट्रेन में मौजूद कर्मियों ने यात्री से दुर्व्यवहार किया।

खुद सरकार ने पिछले वर्ष जुलाई में राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि 2024-25 के दौरान खाने-पीने के सामान की खराब गुणवत्ता के संबंध में 6,645 शिकायतें मिलीं। जबकि 2021 से अगले चार वर्षों में रेलवे को इस तरह की कुल 19,174 शिकायतें मिलीं। ऐसे भी मामले होंगे, जिनमें किसी यात्री को खराब भोजन मिला, लेकिन उसने औपचारिक शिकायत नहीं की।

हालांकि रेल महकमे में कहने को एक ढांचा है, जिसके तहत गुणवत्ता में सुधार के लिए डिजाइन किए गए रसोई से खाना बनवाने और ट्रेनों तक पहुंचाने से लेकर खाना बनाने पर निगरानी, खाद्य सुरक्षा पर्यवेक्षक की तैनाती और अच्छी सामग्री का उपयोग सुनिश्चित करने का दावा किया जाता है।

इसके अलावा, अगर खाने में अस्वच्छता या मिलावट पाई जाती है, खाना खराब हो, तो यात्री शिकायत करते हैं। कई मामलों में कार्रवाई भी होती है, जिसमें जुर्माना लगाना, अनुशासनात्मक कार्रवाई, काउंसलिंग करना और चेतावनी देना शामिल है।

खराब खाने की शिकायत के बाद भोजन की आपूर्ति करने वालों पर जुर्माना लगाने की खबरें आती हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर सब पहले की तरह चलता रहता है। सवाल है कि रेल मंत्रालय इसमें सुधार को लेकर कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाता कि ट्रेन में मिलने वाले भोजन की स्वच्छता और गुणवत्ता को लेकर यात्री पूरी तरह आश्वस्त रहें।

अगर रेलवे के लिए अपने तंत्र के तहत स्वच्छ भोजन मुहैया कराना संभव नहीं है, तो ट्रेनों में खाना देने का ठेका अलग-अलग कंपनियों को देने और उसमें बेहतर गुणवत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा की व्यवस्था बनाने की कोशिश क्यों नहीं की जाती?