देश में सड़क परिवहन की बेहतर सुविधाएं विकसित करने के लिए राजमार्गों का विस्तार और नए एक्सप्रेस-वे का निर्माण सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। दावा किया जाता है कि उच्च तकनीक के इस्तेमाल से बनने वाले इन सड़क मार्गों पर सफर सुरक्षित होगा और वाहनों की तेज गति से समय की भी बचत होगी। मगर, हाल ही में बने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस-वे की मौजूदा स्थिति सरकार के इन दावों की हकीकत बताती है।
इस मार्ग को आधुनिक मशीनों, कृत्रिम मेधा आधारित निगरानी कैमरे और उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली जैसी उच्च तकनीक के इस्तेमाल से तैयार किया गया है, मगर हालत यह है कि पिछले कुछ दिनों में पैंतालीस किलोमीटर की दूरी में औसतन हर दो किलोमीटर पर सड़क धंस जाने की खबरें आर्इं हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में गुणवत्ता के पैमाने को दरकिनार करके इस सड़क का निर्माण किया गया है? अगर ऐसा नहीं है, तो फिर क्या वजह है कि एक माह के भीतर ही सड़क की सतह जगह-जगह धंसने लगी है!
किसी एक्सप्रेस-वे का निर्माण के कुछ समय बाद ही क्षतिग्रस्त हो जाने की यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले माह प्रयागराज को मेरठ से जोड़ने वाले गंगा एक्सप्रेस-वे का लगभग साठ मीटर हिस्सा धंस गया था। इस सड़क मार्ग का उद्घाटन घटना के करीब तीन माह पूर्व हुआ था। जबकि कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर वाहनों की आवाजाही शुरू हुए अभी एक माह भी नहीं हुआ है। इसके अलावा, निर्माणाधीन या लोकार्पण के कुछ दिन बाद ही पुलों के ढह जाने की खबरें भी आए दिन आती रहती हैं।
इससे साफ है कि केवल आधुनिक तकनीक के आधार पर किसी निर्माण कार्य की गुणवत्ता तय नहीं की जा सकती। इंजीनियरों की निगरानी और निर्माण सामग्री की जांच में ढिलाई बरतने का परिणाम इसी तरह की क्षति के रूप में सामने आता है। सड़क निर्माण में खामियां कई बार वाहन दुर्घटनाओं का कारण भी बनती हैं। सच यही है कि जब तक किसी भी सार्वजनिक निर्माण कार्य की ईमानदारी से नियमित निगरानी नहीं जाएगी और संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक मानकों पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाएगा।
